देखि गर्मी की दोपहरी में
धुप भागती दखी
धुप से मुँह छुपाए
लिए लाल लाल गाल लाल हुई
गली गल भटकती
भागती
गिरती पटकती
देखी धुप
राहत पाने को कभी वरिक्शूं से खेलती आँख मिचोली
तो कभी जा बैठती दीवारून से सैट के
पाऊँ सिकोरती
आँचल सर पे ओर्ध्रती देखि
धुप
धुन्दती साए जो सुख पहुंचे
कभी पततूं को हिलाती
फंखा झुलाती
पल भर को ठंडी होने को
माथे से पसीना पोंछती देखी धुप
नदियूं से मिलती नालूँ में झांकती
सागर की लहरून से मिन्नतें करती
गर्मी की दोपहरी की धुप
जहां देखा झरना
गट गट पी जाती
हवा को भी मुँह बाहे खा जाती
गर्मी की दोपहरी की धुप
नहीं पाती राहत
कहाँ हो पाती ठंढी
गर्मी के दोपहरी की धुप
थक हार कर
माथा पीट लेती
जा बैठती
संध्या के सिरहाने
जरा सुख पाने
वोह गर्मी की दोपहरी की
धुप
मंगलवार, 2 जून 2009
garmi ki dhoop
देखि गर्मी की दोपहरी में
धुप भागती दखी
धुप से मुँह छुपाए
लिए लाल लाल गाल लाल हुई
गली गल भटकती
भागती
गिरती पटकती
देखी धुप
राहत पाने को कभी वरिक्शूं से खेलती आँख मिचोली
तो कभी जा बैठती दीवारून से सैट के
पाऊँ सिकोरती
आँचल सर पे ओर्ध्रती देखि
धुप
धुन्दती साए जो सुख पहुंचे
कभी पततूं को हिलाती
फंखा झुलाती
पल भर को ठंडी होने को
माथे से पसीना पोंछती देखी धुप
नदियूं से मिलती नालूँ में झांकती
सागर की लहरून से मिन्नतें करती
गर्मी की दोपहरी की धुप
जहां देखा झरना
गट गट पी जाती
हवा को भी मुँह बाहे खा जाती
गर्मी की दोपहरी की धुप
नहीं पाती राहत
कहाँ हो पाती ठंढी
गर्मी के दोपहरी की धुप
थक हार कर
माथा पीट लेती
जा बैठती
संध्या के सिरहाने
जरा सुख पाने
वोह गर्मी की दोपहरी की
धुप
धुप भागती दखी
धुप से मुँह छुपाए
लिए लाल लाल गाल लाल हुई
गली गल भटकती
भागती
गिरती पटकती
देखी धुप
राहत पाने को कभी वरिक्शूं से खेलती आँख मिचोली
तो कभी जा बैठती दीवारून से सैट के
पाऊँ सिकोरती
आँचल सर पे ओर्ध्रती देखि
धुप
धुन्दती साए जो सुख पहुंचे
कभी पततूं को हिलाती
फंखा झुलाती
पल भर को ठंडी होने को
माथे से पसीना पोंछती देखी धुप
नदियूं से मिलती नालूँ में झांकती
सागर की लहरून से मिन्नतें करती
गर्मी की दोपहरी की धुप
जहां देखा झरना
गट गट पी जाती
हवा को भी मुँह बाहे खा जाती
गर्मी की दोपहरी की धुप
नहीं पाती राहत
कहाँ हो पाती ठंढी
गर्मी के दोपहरी की धुप
थक हार कर
माथा पीट लेती
जा बैठती
संध्या के सिरहाने
जरा सुख पाने
वोह गर्मी की दोपहरी की
धुप
raat bhar
चादर ओर्धे चाँदनी की
रात ..............
रात भर .......
मूंदे अखीयान करती इन्तजार
रात...........
रात भर
साजन का
नींद का ख्वाबून का
तारों से करती बात
रात....
रात भर ...
बदलती रही करवाते रातभर
रात...
जरा सी सरसराहट पर
हर आहात पर चौंक चौंक जाती
रात......
रात भर ....
न नींद आई न ख्वाब ऐ न तुम ही आए
रात भर
करवटें बदलती रही रात ...
रात भर न सोई
ख्यालूँ में खोई
प्यार में बेबस बेकरार
अब गई हार गई
रात......
चादर चांदनी की सरअकने लगी सर से
किरने सूरज क जो आ पडी साथ
मलती आँखे लेती अंग्धाई आधी अधूरी
रात....
उठ चली
छोड़ सिलवाते नींद की गोदी से
रात....
निकल चली वोह गई वोह गई
रात
उमीदे जगाए दिन भगा आया
मिलन की आस लाया
औब ख्वाब देखती हे खुली आन खून से
रात..
दिन भर
रात...
रात ..............
रात भर .......
मूंदे अखीयान करती इन्तजार
रात...........
रात भर
साजन का
नींद का ख्वाबून का
तारों से करती बात
रात....
रात भर ...
बदलती रही करवाते रातभर
रात...
जरा सी सरसराहट पर
हर आहात पर चौंक चौंक जाती
रात......
रात भर ....
न नींद आई न ख्वाब ऐ न तुम ही आए
रात भर
करवटें बदलती रही रात ...
रात भर न सोई
ख्यालूँ में खोई
प्यार में बेबस बेकरार
अब गई हार गई
रात......
चादर चांदनी की सरअकने लगी सर से
किरने सूरज क जो आ पडी साथ
मलती आँखे लेती अंग्धाई आधी अधूरी
रात....
उठ चली
छोड़ सिलवाते नींद की गोदी से
रात....
निकल चली वोह गई वोह गई
रात
उमीदे जगाए दिन भगा आया
मिलन की आस लाया
औब ख्वाब देखती हे खुली आन खून से
रात..
दिन भर
रात...
सोमवार, 1 जून 2009
kayoon kar
तेरी सोच सागर
तेरे ख्याल बादल
तेरी साँसे खुशबू
तेरे इरादे नेक
तेरे वादे पहार
तेरा साथ बहार
तेरी आँखे झील
तेरा मन विशाल
तेरा हुनर कमाल
तेरा पहन बेमिसाल
तेरा वडा वफ़ा
तेरा प्यार पूजा
कयूं कर भाए कोई दूजा
तेरे ख्याल बादल
तेरी साँसे खुशबू
तेरे इरादे नेक
तेरे वादे पहार
तेरा साथ बहार
तेरी आँखे झील
तेरा मन विशाल
तेरा हुनर कमाल
तेरा पहन बेमिसाल
तेरा वडा वफ़ा
तेरा प्यार पूजा
कयूं कर भाए कोई दूजा
tumhare siwa
धुल परई जो सोच पर
उसे झार लूं जरा तो कुछ सोचूँ
नींद से बोझिल पलके ज़रा उठा लूं
तो कुछ देखूं
मन की थकान कोजरा आराम दे लूं
तो कुछ मानु
लगाम ख्यालूँ कीजरा खींच लूं
तो कुछ समझूं
ख्वाबो को जो सुला आऊँ
तो कुछ ध्यान दूं
जुब्बन थम जाए जो पल भर को
तो कुछ कहूं
न सोच साफ़ हुई
न दिल ही मानता है
नाख्यालूँ को ही हे आराम
ख्वाबो को नींद नहीं आती
जुबान को कहाँ हे आराम
पलकें मूंदी ही रहती हे सदा
तो
क्या सोचूँ क्या मानू क्या बोलूँ कया समझूं काया कहूं
तुम्हारे सिवा ........
उसे झार लूं जरा तो कुछ सोचूँ
नींद से बोझिल पलके ज़रा उठा लूं
तो कुछ देखूं
मन की थकान कोजरा आराम दे लूं
तो कुछ मानु
लगाम ख्यालूँ कीजरा खींच लूं
तो कुछ समझूं
ख्वाबो को जो सुला आऊँ
तो कुछ ध्यान दूं
जुब्बन थम जाए जो पल भर को
तो कुछ कहूं
न सोच साफ़ हुई
न दिल ही मानता है
नाख्यालूँ को ही हे आराम
ख्वाबो को नींद नहीं आती
जुबान को कहाँ हे आराम
पलकें मूंदी ही रहती हे सदा
तो
क्या सोचूँ क्या मानू क्या बोलूँ कया समझूं काया कहूं
तुम्हारे सिवा ........
raat
चादर ओर्धे चाँदनी की
रात ..............
रात भर .......
मूंदे अखीयान करती इन्तजार
रात...........
रात भर
साजन का
नींद का ख्वाबून का
तारों से करती बात
रात....
रात भर ...
बदलती रही करवाते रातभर
रात...
जरा सी सरसराहट पर
हर आहात पर चौंक चौंक जाती
रात......
रात भर ....
न नींद आई न ख्वाब ऐ न तुम ही आए
रात भर
करवटें बदलती रही रात ...
रात भर न सोई
ख्यालूँ में खोई
प्यार में बेबस बेकरार
अब गई हार गई
रात......
चादर चांदनी की सरअकने लगी सर से
किरने सूरज क जो आ पडी साथ
मलती आँखे लेती अंग्धाई आधी अधूरी
रात....
उठ चली
छोड़ सिलवाते नींद की गोदी से
रात....
निकल चली वोह गई वोह गई
रात
उमीदे जगाए दिन भगा आया
मिलन की आस लाया
औब ख्वाब देखती हे खुली आन खून से
रात..
दिन भर
रात....
रात ..............
रात भर .......
मूंदे अखीयान करती इन्तजार
रात...........
रात भर
साजन का
नींद का ख्वाबून का
तारों से करती बात
रात....
रात भर ...
बदलती रही करवाते रातभर
रात...
जरा सी सरसराहट पर
हर आहात पर चौंक चौंक जाती
रात......
रात भर ....
न नींद आई न ख्वाब ऐ न तुम ही आए
रात भर
करवटें बदलती रही रात ...
रात भर न सोई
ख्यालूँ में खोई
प्यार में बेबस बेकरार
अब गई हार गई
रात......
चादर चांदनी की सरअकने लगी सर से
किरने सूरज क जो आ पडी साथ
मलती आँखे लेती अंग्धाई आधी अधूरी
रात....
उठ चली
छोड़ सिलवाते नींद की गोदी से
रात....
निकल चली वोह गई वोह गई
रात
उमीदे जगाए दिन भगा आया
मिलन की आस लाया
औब ख्वाब देखती हे खुली आन खून से
रात..
दिन भर
रात....
शनिवार, 30 मई 2009
ek sawaal
मिल जाये जो आज मन मरे
तो फूछूं उससे
कहाँ खोया रहता हे आज कल
ध्यान पर जो पर जाए नजर आज मेरी
तो खबर लूं उस की भी
की किधर की उर्धान भर रहा हे आल कल
कदम जो थम जी थम पल भर को
तो करून सवाल उन से में
की उठते हैं किस की और जाने आककल
कलम को रोके के कहा मेने
के काया लिखती र्हिरती इ किस किस से बातें करती रहती हे आज कल
मन ने कहा तेरे ससाथ
ध्यान बोला तेरे पास
कदम भी चले तेरी और
कलम ने कहा तेरे बिन नहीं कोई और
तो फूछूं उससे
कहाँ खोया रहता हे आज कल
ध्यान पर जो पर जाए नजर आज मेरी
तो खबर लूं उस की भी
की किधर की उर्धान भर रहा हे आल कल
कदम जो थम जी थम पल भर को
तो करून सवाल उन से में
की उठते हैं किस की और जाने आककल
कलम को रोके के कहा मेने
के काया लिखती र्हिरती इ किस किस से बातें करती रहती हे आज कल
मन ने कहा तेरे ससाथ
ध्यान बोला तेरे पास
कदम भी चले तेरी और
कलम ने कहा तेरे बिन नहीं कोई और
mere ban
रागुन में दौरते फिरते हो रकत बन
चल रहे हो संग मेरे वक़्त बन
मस्तिक्ष में रहतो होमर ध्यान बन
सांससून में चलते हो जान बन
थामा हे हाथ मेरा मेरी आन बन
रहते हो साथ मेरे मेरी आन बन
चहरे पर टिके हो मेरा नूर बन
इतराती हूँ में भी तेरी हूर बन
ओंथूं पे रहते हो सदा अ मुस्कान बन
ता उम्र रहना न एक एहसान बन
त्रिपत करते हो इक सची आस बन
उमीदें जगाए हो मेरी प्यास बन
साथ देते हो मेरा मेरे यार बन
सहलाते हो मुझे मेरा प्यार बन
संग से तुम्हारे खिल रहती हूँ बहार बन
समर्पित हूँ में साचा इकरार बन
बदन में बस गए हो मेरी छूं बन
दिल चाहे रहूँ तेरी दुल्हन बन
चल रहे हो संग मेरे वक़्त बन
मस्तिक्ष में रहतो होमर ध्यान बन
सांससून में चलते हो जान बन
थामा हे हाथ मेरा मेरी आन बन
रहते हो साथ मेरे मेरी आन बन
चहरे पर टिके हो मेरा नूर बन
इतराती हूँ में भी तेरी हूर बन
ओंथूं पे रहते हो सदा अ मुस्कान बन
ता उम्र रहना न एक एहसान बन
त्रिपत करते हो इक सची आस बन
उमीदें जगाए हो मेरी प्यास बन
साथ देते हो मेरा मेरे यार बन
सहलाते हो मुझे मेरा प्यार बन
संग से तुम्हारे खिल रहती हूँ बहार बन
समर्पित हूँ में साचा इकरार बन
बदन में बस गए हो मेरी छूं बन
दिल चाहे रहूँ तेरी दुल्हन बन
शुक्रवार, 29 मई 2009
mehal ho sapno ka
आचल के तुजे में ले के चलूँ
ख्वाबून के पंखून पे हो के सवार
च चले क्षतिज के उस पार
महल ऐसा बनाए जिसके न हूँ दरू दिवार
जहां हो बस में तुम और प्यार ही प्यार
यह कैसा अजुनूं हे सवार
इस से मन गया हार
आ चल के चले उस पार
जहां फूल ही फूल हे नहीं कोई खार
दे दूं तुझ को बाहूं के हार
बेबस हो के तू दिल जाए अपना हार
आ जा के हो के ख्वाबो के पंखून पे सवार
चले हम दोनों करे बस प्यार ही प्यार
ख्वाबून के पंखून पे हो के सवार
च चले क्षतिज के उस पार
महल ऐसा बनाए जिसके न हूँ दरू दिवार
जहां हो बस में तुम और प्यार ही प्यार
यह कैसा अजुनूं हे सवार
इस से मन गया हार
आ चल के चले उस पार
जहां फूल ही फूल हे नहीं कोई खार
दे दूं तुझ को बाहूं के हार
बेबस हो के तू दिल जाए अपना हार
आ जा के हो के ख्वाबो के पंखून पे सवार
चले हम दोनों करे बस प्यार ही प्यार
meri dor
अब डोरे मेरी पतंग की हे तेरे हाथ
रहन सदा मुझे हे तेरे ही साथ
वादा कर की न छोरे गा साथ
भले ही अभी छूट जाए हाथ
तेरी बन जाऊं गी
तेरी ही हो जाऊं गी
तू कहे दिन तो दिन बन जाऊं गी
रात भी कहे गर तो रात हो जाऊं गी
तेरी ख़ुशी तेरी मुस्कान तेरी हंसी बन जाऊं गी
तेरी चाहत
तेरी राहत तेरा सकूं बन जाऊंगी
तेरे लिए दुनिया के सुब ताने सह जाऊंगी
हर गम दुनिया का अपनाऊँ गी
तेरे नाज़ नखरे सुब पल्कूं पे उठाऊँ गी
गर तू जो कहे भूल जा
में तुझे न कभी भूल पाऊँ गी
रहन सदा मुझे हे तेरे ही साथ
वादा कर की न छोरे गा साथ
भले ही अभी छूट जाए हाथ
तेरी बन जाऊं गी
तेरी ही हो जाऊं गी
तू कहे दिन तो दिन बन जाऊं गी
रात भी कहे गर तो रात हो जाऊं गी
तेरी ख़ुशी तेरी मुस्कान तेरी हंसी बन जाऊं गी
तेरी चाहत
तेरी राहत तेरा सकूं बन जाऊंगी
तेरे लिए दुनिया के सुब ताने सह जाऊंगी
हर गम दुनिया का अपनाऊँ गी
तेरे नाज़ नखरे सुब पल्कूं पे उठाऊँ गी
गर तू जो कहे भूल जा
में तुझे न कभी भूल पाऊँ गी
गुरुवार, 28 मई 2009
mere hi liey
चाँद निकलता हे मेरे लिए
शायद अम्मवास भी आती हे मेरी ही लिए
चढ़ता हे सूरज मेरी लिए
अस्त भी होता हे मेरे ही लिए
चलती हे हवाए सन्न सनन मेरे लिए
गूम्मा सा होजाता हे जब रूकती हे हवाए मेरे ही लिए
मौसम आते जाते हे मेरे लिए
खिलते मुरझाते हे फूल मेरे ही लिए
बहते हे जो झरने कल कल मेरे लिए
तो रुके ठ्हेरे पानी भी हे मेरे ही लिए
उमर्ध उमर्ध आती हे घटाए गर मेरे लिए
तो छमा छम कभी रिम झिम बरसती हे मेरे ही लिए
खुश हे फिसाए उदास भी हो रहती मेरे ही लिए
सारी कायनात ही हस्ती रोटी भी हे मेरे ही लिए
जब से
बन के प्यार तुम आए मेरे लिए
गुमान न कर्रूँ में मेरे लिए
इतना न इतराऊँ में मेरे ही लिए
क्यूं में जो हूँ तो बस तुम्हारे ही लिए
शायद अम्मवास भी आती हे मेरी ही लिए
चढ़ता हे सूरज मेरी लिए
अस्त भी होता हे मेरे ही लिए
चलती हे हवाए सन्न सनन मेरे लिए
गूम्मा सा होजाता हे जब रूकती हे हवाए मेरे ही लिए
मौसम आते जाते हे मेरे लिए
खिलते मुरझाते हे फूल मेरे ही लिए
बहते हे जो झरने कल कल मेरे लिए
तो रुके ठ्हेरे पानी भी हे मेरे ही लिए
उमर्ध उमर्ध आती हे घटाए गर मेरे लिए
तो छमा छम कभी रिम झिम बरसती हे मेरे ही लिए
खुश हे फिसाए उदास भी हो रहती मेरे ही लिए
सारी कायनात ही हस्ती रोटी भी हे मेरे ही लिए
जब से
बन के प्यार तुम आए मेरे लिए
गुमान न कर्रूँ में मेरे लिए
इतना न इतराऊँ में मेरे ही लिए
क्यूं में जो हूँ तो बस तुम्हारे ही लिए
pyaar
एहसास सा होने लगा हे
कोई बहुत करीब आने लगा हे
दिलू जान से चाहने लगा हे
दर सा लगने लगा हे
कुछ कुछ होने लगा हे
सोया प्यार जागने लगा हे
उमंगें अंगराई लेने लगी हैं
मन भर भर आने लगा हे
सपने दिन में दिखाने लगा हे
कोई इतने करीब आने लगा हे
दिल को धर्काने लगे हे
एहसास जगाने लगा हे
कोई बहुत प्यारा लगने लगा हे
मुझेई शायद प्यार होने लगा है
कोई बहुत करीब आने लगा हे
दिलू जान से चाहने लगा हे
दर सा लगने लगा हे
कुछ कुछ होने लगा हे
सोया प्यार जागने लगा हे
उमंगें अंगराई लेने लगी हैं
मन भर भर आने लगा हे
सपने दिन में दिखाने लगा हे
कोई इतने करीब आने लगा हे
दिल को धर्काने लगे हे
एहसास जगाने लगा हे
कोई बहुत प्यारा लगने लगा हे
मुझेई शायद प्यार होने लगा है
बुधवार, 27 मई 2009
pukara tum nein mujhei pyaar mein
चाद निकल आया हे अँधेरी रात में
जुगनू टिमटिमा रहे हैं आँगन में
खुशबूएं फेल गईं हैं फिजाओं में
फूल भी खिलखिला के हस रहे हैं बाग़ में
अन्ग्र्दाई सी आ रही हे बादलूँ में
मस्ती सी दीक परती है हवाओं में
खुमारी सी छा गयी हे जिंदगी में
उमंगें जाग गयी हैं मनमें
गुदगुदी सी हो रही है रूह में
घंटियाँ बज उठी तन में में
कम्पन सी जग गयी हे ओंठूं में
मुस्कुराहट से फेल गई हे आन्खून में
देखो हरकत सी हो रही है रुके हुए दिल में
चुपी सी लग्ग गयी है जुबान में
ख़ुशी के आनसु आ के रुके हैं मेरी आन्खून में
आज फिर से पुकारा हे मुझे किसी ने प्यार में
जुगनू टिमटिमा रहे हैं आँगन में
खुशबूएं फेल गईं हैं फिजाओं में
फूल भी खिलखिला के हस रहे हैं बाग़ में
अन्ग्र्दाई सी आ रही हे बादलूँ में
मस्ती सी दीक परती है हवाओं में
खुमारी सी छा गयी हे जिंदगी में
उमंगें जाग गयी हैं मनमें
गुदगुदी सी हो रही है रूह में
घंटियाँ बज उठी तन में में
कम्पन सी जग गयी हे ओंठूं में
मुस्कुराहट से फेल गई हे आन्खून में
देखो हरकत सी हो रही है रुके हुए दिल में
चुपी सी लग्ग गयी है जुबान में
ख़ुशी के आनसु आ के रुके हैं मेरी आन्खून में
आज फिर से पुकारा हे मुझे किसी ने प्यार में
chaand
में चाँद की तरेह हूँ
भीख की रौशनी पे इतराती हूँ
कया दे पाऊँ गी तुम्हे में खुद मांगके खाती हूँ
खाली बर्तन को नादेखो ललचाती नजरूं से
में खुद को देख देख लज्जाती हूँ
तरसी हो जो खुद ता उम्र प्यार को
में ऐसी ही इक प्यासी नदी हूँ
न बेईठो मेरे इतने करीब किमें फिर बहुत सताती हूँ
जब मिलती हूँ तो सुख देती हूँ शायद
पर जाती हूँ तो बहुत याद आती हूँ
मत भूलो की में मया हूँ
मिलूँ तो भी भिच्रून तो भी बहुत बहुत सताती हूँ
भीख की रौशनी पे इतराती हूँ
कया दे पाऊँ गी तुम्हे में खुद मांगके खाती हूँ
खाली बर्तन को नादेखो ललचाती नजरूं से
में खुद को देख देख लज्जाती हूँ
तरसी हो जो खुद ता उम्र प्यार को
में ऐसी ही इक प्यासी नदी हूँ
न बेईठो मेरे इतने करीब किमें फिर बहुत सताती हूँ
जब मिलती हूँ तो सुख देती हूँ शायद
पर जाती हूँ तो बहुत याद आती हूँ
मत भूलो की में मया हूँ
मिलूँ तो भी भिच्रून तो भी बहुत बहुत सताती हूँ
amrita
में नहीं न हूँ वोह
जो आप सम्झेई हैं मुझे
मै गुम नाम बेनाम
शायद हूँ मै बदनाम
सुबह की धुंद जो छट जेइगी
शाम का धुंआ जो हो रहे गा धुंआ
छाया हूँ या की हूँ माया
छलावा हूँ या की हूँ सपना कोइ द्रादनाक
संध्या हूँ की सन्नाटा
शमशान हूँ या की वीराना कोई
कोई भूल नहीं
शूल चुबा सीने में हूँ मैं
इक टीस
इक चीख
एक हूक
उठती हेई जो सीने में रेह्रेह कर
दर्द हूँ दिल का
या हूँ रोगे कोई
एक सिसकी
इस सुबकी
इक आह हूँ दुब्बी दुब्बी
एक कतरा आन्सो
जो आँख से टपका और भिखर गया
नहीं में वोह नहीं जो समझे थे तुम मुझे
अमृता...............................................तो बस यूंही
क्यूं की तुम कहते हो
जो आप सम्झेई हैं मुझे
मै गुम नाम बेनाम
शायद हूँ मै बदनाम
सुबह की धुंद जो छट जेइगी
शाम का धुंआ जो हो रहे गा धुंआ
छाया हूँ या की हूँ माया
छलावा हूँ या की हूँ सपना कोइ द्रादनाक
संध्या हूँ की सन्नाटा
शमशान हूँ या की वीराना कोई
कोई भूल नहीं
शूल चुबा सीने में हूँ मैं
इक टीस
इक चीख
एक हूक
उठती हेई जो सीने में रेह्रेह कर
दर्द हूँ दिल का
या हूँ रोगे कोई
एक सिसकी
इस सुबकी
इक आह हूँ दुब्बी दुब्बी
एक कतरा आन्सो
जो आँख से टपका और भिखर गया
नहीं में वोह नहीं जो समझे थे तुम मुझे
अमृता...............................................तो बस यूंही
क्यूं की तुम कहते हो
prem kahani
एक धरकन छोटी सी
बैठी घुटनों पर ठुदी तिकाएय
घर की देहलीझ पर
कुछ इस तरह टिकटिकी लगाए
राह पर
मानो हो किसी राही के इन्तजार में ..........
बैठी रही बरसून
बरसून बेठी रही
फिर अचानक एक दिन
दिल के द्वार पर दस्तक दी
एक धड़कते दिल ने
न जाने काया आया मन में उठ के चल दी
संग होली उस दिल के
न कुछ कहा
न ही पुछा
बस यूंही संग संग धरकने लगे दोनों
समा गए इक दूजे मेंईसे
न जुदा होंगे जैसे
फूल से खुशबू
हवा से रवानी
लहर से पानी
चाँद से चाँदनी
सूरज से रौशनी
एक ने कही दुसरे ने मानी
यूंही चलती गयी जिंदगानी
ना कही ना जानी
और सभी ने मानी............
बस यही है मेरी प्रेम कहानी
बैठी घुटनों पर ठुदी तिकाएय
घर की देहलीझ पर
कुछ इस तरह टिकटिकी लगाए
राह पर
मानो हो किसी राही के इन्तजार में ..........
बैठी रही बरसून
बरसून बेठी रही
फिर अचानक एक दिन
दिल के द्वार पर दस्तक दी
एक धड़कते दिल ने
न जाने काया आया मन में उठ के चल दी
संग होली उस दिल के
न कुछ कहा
न ही पुछा
बस यूंही संग संग धरकने लगे दोनों
समा गए इक दूजे मेंईसे
न जुदा होंगे जैसे
फूल से खुशबू
हवा से रवानी
लहर से पानी
चाँद से चाँदनी
सूरज से रौशनी
एक ने कही दुसरे ने मानी
यूंही चलती गयी जिंदगानी
ना कही ना जानी
और सभी ने मानी............
बस यही है मेरी प्रेम कहानी
किसी ने कहा ...
किसी ने कहा ...अमृत नाम में कुछ तो है
जो जीवन दायिनी है ...
तभी तो 'अमृता' का ख्याल ही भर देता है
रग रग में ऊर्जा, उमंग और उत्साह !
अमृत का अस्तित्व कहीं है
तो वहीं कहीं है
जहां है अमृतघट का सिन्धु, अमृता - अमृत परिसर ...
मन से छुअन सिहरन देती है
तन की छुअन सा अहसास भी ..
अमृत बरसा जाती है
च्यवनप्राश बन जाती है
आती है चिर युवा होने का अहसास जगाने ..
कहाँ बसा है वह अमृत घट ,
कहीं तो नहीं सिवा ह्रदय के
जगाता है जीवन जीने की चाह
अमरता - नश्वरता के बीच का सेतु सा,
दौडा देता है खोज में उस कस्तूरी मृग की
जो है सदा से मेरे भीतर
सुगन्धित करता रहता है
चिरंतन निरंतर .. सदा सर्वदा... अमृता की तरह...
मंगलवार, 26 मई 2009
chaand
चाँद को देखो
कितना सुन्दर कितना प्यारा
पर हे उस के मनमें दुःख का दाग़
ले कर कासा भीख का हाथ ्मे
रोज़ करे मिन्नत
सूरज की
तरसे प्रीत की चांदनी को
मांगता फिरता
एक बूँद प्यार की
कभी जो रवि को तरस आजी
टपका दे बूँद इक प्यार के
ख़ुशी से फूला न समता हो रहता हेई चाँद पहेली का
फिट उसी ख़ुशी में देखो देखो
हो चला हे दूझ का वोह
फिर इतराता होता तीझ का
और चौथ का हो रहता
कभी जो प्रस्संं हो जाय रवि देवता प्रकाश का
तो हो रहता यह चाँद प्यारआ चौदवीं का
चाँद हमारा
कितना सुन्दर कितना प्यारा
पर हे उस के मनमें दुःख का दाग़
ले कर कासा भीख का हाथ ्मे
रोज़ करे मिन्नत
सूरज की
तरसे प्रीत की चांदनी को
मांगता फिरता
एक बूँद प्यार की
कभी जो रवि को तरस आजी
टपका दे बूँद इक प्यार के
ख़ुशी से फूला न समता हो रहता हेई चाँद पहेली का
फिट उसी ख़ुशी में देखो देखो
हो चला हे दूझ का वोह
फिर इतराता होता तीझ का
और चौथ का हो रहता
कभी जो प्रस्संं हो जाय रवि देवता प्रकाश का
तो हो रहता यह चाँद प्यारआ चौदवीं का
चाँद हमारा
thoonth
सरक के किनारे खरा में
एक बहुत पुराना एकला ठूंठ हूँ में
रोज़ इसी इन्तजार में हूँ
की पल भर को कोई आएय और आके मेरा हाल बताएं
में भी कुछ पाऊँ कुछ खो दो उस के मिलने में
कभी बुझेई मेरी भी प्यास
हाँ आतें थे
कभी कभार
मेरी छाया का सुख भोगने पल दो पल को
मुसाफिर देते थे चल अपनी अपनी राह
में वही खरा
एकला फिर तकता हूँ राह किसी दूजे की
मीठी ठन्डी छाया
मधुर खुसबू मेरे पतूं
फूलों की
मीठा स्वाद मेरे फलूं का
सुब चखते थे
पर मेरा कोई हो जाए सदा के लिएय ऐसा कभी न होपाया
इस मतलब के संसार में सुब मिलते हैं कुछ ले जाने को
बिचर जातें हैं तरपाने को
करके वादा फिर मिलने का
कभी न लो़त कर आतेइहें
कुछ ऐसा ही है
दस्तूर यहाँ का
ले ले ते हेई भूल जातें हैं देना
तभी तो हूँ में आज भी अकेला
एक बहुत पुराना एकला ठूंठ हूँ में
रोज़ इसी इन्तजार में हूँ
की पल भर को कोई आएय और आके मेरा हाल बताएं
में भी कुछ पाऊँ कुछ खो दो उस के मिलने में
कभी बुझेई मेरी भी प्यास
हाँ आतें थे
कभी कभार
मेरी छाया का सुख भोगने पल दो पल को
मुसाफिर देते थे चल अपनी अपनी राह
में वही खरा
एकला फिर तकता हूँ राह किसी दूजे की
मीठी ठन्डी छाया
मधुर खुसबू मेरे पतूं
फूलों की
मीठा स्वाद मेरे फलूं का
सुब चखते थे
पर मेरा कोई हो जाए सदा के लिएय ऐसा कभी न होपाया
इस मतलब के संसार में सुब मिलते हैं कुछ ले जाने को
बिचर जातें हैं तरपाने को
करके वादा फिर मिलने का
कभी न लो़त कर आतेइहें
कुछ ऐसा ही है
दस्तूर यहाँ का
ले ले ते हेई भूल जातें हैं देना
तभी तो हूँ में आज भी अकेला
सोमवार, 25 मई 2009
heavens
it just feels as if some has him self gone to the gardens of heaven collected not only the dew drops off the newly sprouted petals and the fragrance of the flowers with their own eyes dipped then in the ocean of love that is flowing in thy heart and has sent them my way through the clouds before the dawn first ray of sun shine reaches the earth it showers on my face the soft love you send every single day your love is poise so pure like the morning dew drops that come from heaven
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