बुधवार, 2 नवंबर 2011
बस होने लगती है खुद ब खुद
जब जब
खुदा के पाक हाथ छू जाते हैं
किसी जबीं को
थाम लेते हैं जेहन की अंगुली
कर के रूह के पंखून पर सवार
ले जाए ब्रह्माण्ड के उस पार
खुद ही खुदा
तो उस के नक़्शे प् ही हो रहते हैं
किसी कविता के हर्फ़
और रह रह कर उभर आते हैं जेहन में
उत्तर आते हैं किसी की जुबानी
कविता बन बन
शुक्रवार, 10 जून 2011
>झंकार बना रख लो अपने साजून की तारून पर
>कर लो शामिल अपने गीतूनमें
>बना लो मुझे अपने बोल
> चाहे गम ही अपना समझ
>बसा लो दिल में
> बिठा लो अपनी यदुन की कतारों में कभी
>रख लो अपनी धर्कनूमें
>रूह से चिपका लो मुझे
>आपने स्पर्शून्में से कुछ सपर्श बाँट लो मेरे साथ
> रख लोअपने भीतर कहींभी
>टीस सीने की चुन्हन चाहे हो रहूँ मन की
>देदो ना थोड़ी जगह अपनी जिन्दी में मुझे भी
>की जी जाऊं में पल दो पल
>साथ तुम्हारे
>नजर भर देख लो एक बार जो
>जी जाऊं में युगून तह यूंही
>--
> चल के के पाऊँ पाऊँ
>धर्कनू पर हो कर सवार
>लगाम ले कर हाथूं में
>दौराते घोड़े अपनी धरकनो के
>छू लो मुझे
>थाम लो मेरे हाथ आज
>समेट कर सब अपने जज़्बात
>रोक लो साँसे अपनी
>खो जाओ
>सपनो में
>और आ जाओ ..........................
>
>मेरे दिल के आगोश में ............
>
> बस रहो
> कर लो घर इसे अपना
> की आज घर पर कोई नहीं
>बस में और तुहारी यादें
>खेल रही हैं आंखमिचोली
>
>अब चले भी आओ ना सताओ
>की थक गई हैं साँसे मेरी
>अब नहीं तक सकती और राह तुम्हारी
>मेरी नजर कमजोरे हो चली
>
> किवाड़ भी तक तक ऊंघने लगा है
> दस्तक को भी ऊंचा सुनने लगा है
>
>चले आओ अब तो
>की मूँद पाऊँ मैं यह पलकें थकी थकी
>कमी तुम्हारी खलती रहे गी
>
>सर्द हवाएं तीखी दोपहरी
>तेरी याद यूंही बनी रहे गी
>
>सावन की बद्री हवाएं पतझर की
>साथ मेरे यूं ही चलती रहे गी
>
>वोह चाय की प्याली
>वोह सिगरेट बुझी
>तेरे जाने की खबर देती रहे गी
>
>सिरहाने खामोश
>वोह सिलव्तें चदर की
> कहानी रात खुद अपनी कहे गी
>
>वीरानी गलियां
> खामोश रातें
> चांदनी यूंही एकेली पड़ी रहे गी
>
>
रविवार, 1 मई 2011
क्या यही प्रीत है
जो मद्धिम हवा के झोंके सी
जो झरने के मीठे पानी सी
जो प्रीत के आंसू सी खारी
जो श्रम-संचित बूँद पसीने की !
क्या यही प्रीत है ??
जो खुशबू का एहसास लिए
जो चाहत की मीठी प्यास लिए
मिलने का इन्तजार लिए
नज़दीकी का एहसास लिए
क्या यही प्रीत है ??
जो वियोग डर से कम्पित
जो तन्हाई भय से शंकित
वो रुनझुन से करती छा जाती
अकस्मात ही आ जाती
वो बने काव्य, और भा जाए
तो प्यार न कैसे हो जाए
डर है ये टूट न जाए लड़ी
जिससे मेरी हर याद जुडी
कविता है बस्ती है मन में
अटखेली करती मन आँगन में
क्या यही प्रीत है ??
तेरी याद में
याद तेरी बस आती है
दिल की धडकन बढ़ जाती है
चित चैन कहीं खो जाता है
जब तू ख्याल में आता है |
स्पर्श सभी जग जाते हैं
आँखें भी नम हो जाती हैं
आँखों से आंसूं झरते हैं
ज्यों मन का ताप पिघलता है
पल-छिन महीने बरस-बरस !
दिल मिलने को गया तरस !
पलक पांवड़े बिछा राह में
सदियों से मन की एक पुलक !
चाँदनी रात की चादर पर
कदम कदम हम बढ़ते हैं
मंजर, सफ़ेद पन्नो पर ज्यों
कुछ हरफ –ब-हरफ उभरते हैं
कि, यकायक ही हर सु
कविता सी बिखरने लगती है
जिसे समेटे आँचल में हम
दिन रात मचलते फिरते हैं
यही धरोहर छुपा जगत से
सीने से लगाए फिरते हैंगुरुवार, 21 अप्रैल 2011
मैं, तेरी छाया !!
शीतकाल की मद्धिम धूप बनूँ और तुझ पर मैं छा जाऊं
मैं बनूँ ग्रीष्म में छांव, तुझे रह रह कर शीतल कर जाऊं
बन जाऊं बदरिया सावन की, बरसूं मन पर घनघोर पिया
चमकूँ यादों की बिजली बन, ‘बाती’ मैं - तू मेरा ‘दिया’
बन जाऊं शीतल मंद पवन, तेरा तन मन दरसूं-परसूं
बन जाऊं बहती नदिया, कि बन लहरे, मैं हरदम हरसूँ
जल बन कर सारी प्यास बुझादूं तेरे तन मन के उपवन की
तितली बन तुझ पर मंडराऊं, हो जाऊं तेरे मधुबन की
क्या यही प्रीत है
जो मद्धिम हवा के झोंके सी
जो झरने के मीठे पानी सी
जो प्रीत के आंसू सी खारी
जो श्रम-संचित बूँद पसीने की !
क्या यही प्रीत है ??
जो खुशबू का एहसास लिए
जो चाहत की मीठी प्यास लिए
मिलने का इन्तजार लिए
नज़दीकी का एहसास लिए
क्या यही प्रीत है ??
जो वियोग डर से कम्पित
जो तन्हाई भय से शंकित
वो रुनझुन से करती छा जाती
अकस्मात ही आ जाती
वो बने काव्य, और भा जाए
तो प्यार न कैसे हो जाए
डर है ये टूट न जाए लड़ी
जिससे मेरी हर याद जुडी
कविता है बस्ती है मन में
अटखेली करती मन आँगन में
क्या यही प्रीत है ??
बुधवार, 2 मार्च 2011
यादों का झरोखा
मिली हमे अपने आँगन में
थाली भर थी रौशनी ...
भगोना भर भर चांदनी ...
तारों की छांह कटोरी भर-भर
पाए, झौखे सर्द-गर्म से
झरते पत्तों का दीवानापन .....
बरखा भी भीगी भीगी सी ......
ज्यों जुगनू सी कोई कोई
यादें आएं, खोई खोई सी .......
देखि हैं कुछ मीठी मीठी बातें
कुछ खाते खाते पल
कुछ मिलन की खुशियाँ
जुदाई का ढेर सारा गम ........
जब भी कभी झाँका है हमने
किसी द्वार की आड़ ......
फिर जब अंत में झांका हमने
और वो ढलका ढलका आँचल ...
वो मिलन के पहले पल ...
वो रूठना मनाना |
जब भी कभी चुपके से बैठ
बुधवार, 16 फ़रवरी 2011
घनी इक छांव से हो तुम
सुहानी शाम से हो तुम
बसंत बहार से हो तुम
घनी इक छांव से हो तुम
’सुकूँ-आराम’ से हो तुम
मधुर संगीत से हो तुम
मधुर झंकार से हो तुम
मधुर मुस्कान से हो तुम
मेरी तो ‘शान’ से हो तुम
कोई सपना सा हो तुम
मेरा अपना सा हो तुम
मेरे दिल की धडकन तुम
मेरी सांसों की सरगम तुम
अनबुझी-प्यास से हो तुम
अनकही-आस से हो तुम
मेरी तो जिंदगी हो तुम
मेरी तो जान ही हो तुम ........
एक उदास सांझ ...
मुरझाए फूल
पथरीली चट्टान
ठहरे झील के पानी से
रात अमावस की
कडकती दोपहरी बैशाख की
तूफानी हवाएँ
वीरान फिज़ाएँ
इतनी खामोशी
कभी उदासी हो नाम हमारा ...
कभी कहानी
अधूरी सी
तो कभी कविता
अनकही
टूटते सपने कहीं
नाउम्मीदी कभी
जो भी हों
जहां भी हों
हम
दुःख ही होते हैं
दुःख ही देते हैं
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
परछाई ...
कभी चाँदनी सा मृदु रूप
कभी तू तितली वन उपवन
कभी भंवरे की सी गुनगुन
कभी साहिल कभी मझधार
कभी इस पार कभी उस पार
जिस रंग में तू रंग ले साजन
में वैसी ही हो जाती हूँ
रविवार, 30 जनवरी 2011
दिल धडके मेरा घडी-घडी
मेरी सब राहें मुड़ी मुड़ी
चाहे जुल्फें उलझी-उलझी
पर उलझन सब सुलझी-सुलझी
जो कहते थे मेरे दुखड़े
ध्यान था तब बिखरा-बिखरा
पर अब है मन निखरा-निखरा
जब से तुम से मैं मिली-मिली
कितनी रहती हूँ खिली-खिली
सपने नयनों में यों जुड़े जुड़े
जब से ये नयना लड़े लड़े
गम हुए सभी अब जुदा जुदा
शनिवार, 25 दिसंबर 2010
ज़ज्बातों का दौर चल पडा हर ज़ज्बात तुम्हारे हैं
गुरुवार, 23 दिसंबर 2010
सैंया मेरे !
मेरे आंखों के सपने
मेरी सेज मुझे लौटा दे
लौटा दे मेरे वो मौसम सुहाने
लौटा दे
पर मुझ को मेरी यादें
मुझ से साँसे ले ले मेरी
पर तू मुझको मेरे
ले ले सारे सगे बिराने
मेरे सैंया
चाहे ले ले खुशियाँ सारी
तुझ बिन नीरस निष्फल जीवन
ले ले सारे सगे बिराने
सोमवार, 13 दिसंबर 2010
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
न दिल ही है बिछुडा ।
ज़रा सी ये दूरी
थी थोडी ज़रूरी ।
वरना ये सासें भी
ज़ख्मी हो जातीं ।
तेज़ हो चली थी,
ठहर न रही थी ।
ये थोडा सा संयम
और थोडा सा विरहा ।
मुझे थाम लेगा
मुझे राह देगा ।
राहें थी प्यारी
मुझे यूं लुभाती
भटक मैं चला था
ठहर न रहा था ।
मेरी थी गलती
तो सज़ा मैं ही मांगूँ
कष्ट जो तुम्हे हो
तो क्षमा भी मैं मांगूँ
मुझे माफ करना
खता भूल जाना
जो राहें पुरानी
उसी राह जाना ।
पल जो गुज़ारे
संग संग तुम्हारे
है मेरी अमानत
उसे न भुलाना ।
शनिवार, 19 जून 2010
उंगली जो थमी थी बरसो से छूट गई हो जैसे
नन्ही सी आन्सो की बूँद पलकों से टपकी कुछ ऐसे
दर्द का सह्लाब बह निकला हो जैसे
वक़्त के हाथों से लम्हा इक गिरा यूं
पछता रही हूँ आज भी इक यह हुआ कयूं
कतरा कतरा जिंदगी रोई कुछ ऐसे
तिल तिल कर जले दिए में लौ जैसे
सान्सून की लड़ी से सांस इक गिर गई कयूं
आखिर तुम मुझे छोड़ कर चल दिए कयूं
याद इक छुट गई पीछे कहीं सदियूं से परे
जब से रहने लगे हो तुम हम से कुछ परे परे
शनिवार, 12 जून 2010
मिली नही
मिली नही नजर कि बस जुबान बन गई
आवाज़ का खयाल ही तो कान बन गई
ओंठ कपकपा उठे पर दिल न कह सका
ये कैसी शर्म है कि जो गुलाल बन गई
शरारतों में, छुअन का ख्याल बस गया
एहसास छुप सका न, बेनक़ाब बन गई
बेबाक चले आये हो इस कदर जो सपन में
आंखे मेरी, ज़माने का हर ज़वाब बन गई
सहर होने को है, और ये बेहिज़ाब हो गई
बस गए हो दिल में, तो ताज़िन्दगी रहो
ये घर है अब तुम्हारा, मैं बेमकान हो गई
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
न जाग पाऊं कभी
तो जगा देना मुझे
पाप हो जाये अगर
तो सज़ा देना मुझे
अंधे हैं हम सब
इस अंधेर नगरी में
ठोकर खा कर गिर पडून
तो हाथ बाधा उठा देना मुझे
सोया है मन सो गई आत्मा
दुनिया की भीढ़ में खोया अस्तित्व
झाक्जोर कर
हे प्रभु,
उंगली पकड कर
तुम मुझे अवलम्ब दे दो
ठगिनी बहुत,
माया जगत की,
ये नचा दे ना मुझे ....