सोमवार, 5 अप्रैल 2010

खेल रही मृगछौने सी कमरे कमरे धूप,

चिडिया चीं चीं कर उठी खिला धूप का रूप ॥

खिला धूप का रूप बसंती मौसम आया,

किस बाला ने किस कूंची से इसे सजाया ॥

रूप अनोखा सज उठा छुप गया रूप चितेरा
मन वीणा भी बज उठी, कण कण हुआ सवेरा ॥

छम छम करती देखो होथूं पर मुस्कान चली आई
चमक चांदनी सी अखियूं में पहचान चली आई

रुन झुन करती बागो में लो हर काली आई
झोली भर खुशीआं ले में भी तेरी गली आई

घर आँगन में रौनक यह यूं भली आई
लो आज बसंती हवा यह संदेसा लाइ

खूब खिलो हसो महको सब आज बसंत ऋतू आई

सोमवार, 15 मार्च 2010

तेरी याद !!

तेरी याद !!


नंगे पावँ

बिन आहट

चुप चाप चली आती है


सुब्ह सवेरे

मेरी नीद के द्वारे पर

दस्तक दे मुझे जगाती है


मेरी अंखियों से

चुपके से

नींद चुरा ले जाती हे


मन के वसूने कोने में

मीठी सी

गुदगुदी सी कर जाती हे


कानों में धीरे से

प्यार के बोल

फुसफुसाती है


कर आलिंगन

चूम गले को

बालों को सहलाती है


हर पल दिल को

और रूह को

नाजुक सा छू जाती है


कभी सिरहाने बैठ देखती

कभी जगा, मुझ से बतियाती है


तेरी याद



दिन भर यूं ही

मेरा साथ निभाती है

फिर थक कर

मेरे तकिए पर

सर रख रात बिताती है


नींद उनींदी,

याद रात भर

सुख सपने दिखलाती है
फिर सुबह सवेरे

चुपके से आ

सहला मुझे जगती है

जब तुम जाते हो

पल पल भारी

यादें बहुत सताती है

जाने को तो तुम जाते हो

याद यहीँ रह जाती हैं



मुझको बहुत सताती है ।



नंगे पावँ

बिन आहट

जाती हैं - आती है ।

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

साजन की धडकन का गीत

साजन की धडकन का गीत



बन के धड़कन, तेरे दिल में, धडका करूँ

रूह बन कर, तेरे तन में, बसती रहूँ ॥



बन के दृष्टि, समाऊँ, तेरे नैन में
तेरी नज़रों से, दुनिया, यूँ देखा करूँ ॥



मैं जो छू लूं, तो सिहरन, तेरी बन रहूँ

तू जो छू ले, तो निस दिन, ही महका करूँ ॥



तू जो बोले, तो निकले, मेरे बोल ही

जब भी बोलूँ, तेरी बातें, बोला करूँ ।।



पास बैठूँ, तेरे तो, सखा भाव से,

तेरी संगी बनूं और सखी हो रहूँ ॥

औढे तू जो, अगर, बन जाउँ औढनी
बिछ जाउँ, तेरे तल, बिछौना बनूँ ॥

तू चले तो, चरण में खडाऊ बनूँ

तेरी सांसें बनूं, संग हमेशा रहूँ ।।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

कभी जो फुरसत हो तुम्हे

कभी जो फुरसत हो तुम्हे

दिल के दरवाज़े पर दस्तक देती है, सहमी सी इक धडकन हर रोज़
सूनी अखियाँ बेबस सी, करती ही रहती हैं तुम्हारा इन्तजार हर रोज़


कभी जो फुरसत हो और सुन पाओ उस दस्तक को तो झांको
दिल की आंखों के झरोखों से तुम पाओगे मेरी बेकसी हर रोज़


बस देख लेना नज़र भर , इस अकेली सी धडकन को
जो सूनी राहों में करती ही रहती है इंतजार हर पल हर रोज़


इक नजर प्रेम भरी जो मिल जाए, जी जायेगी सांसे, थिरक उठेगी
जा बसेगी दिल में, धडकेगी तुम्हारे तन मन में, हर पल हर रोज़


बस ही गए हो जो आंखों में, तो न जाओ इस दिल से भी कभी
बसे रहो धडकनों में - ख्वाबों में - ख्यालों में, यूं ही पल पल हर रोज़

रविवार, 22 नवंबर 2009

कैसा यह अहसास मुझे अब !!

एहसास सा यह होने लगा है ।
करीब मेरे कोई आने लगा है ।।

दिल-ओ-जाँ से जैसे कि चाहने लगा है ।
कुछ प्यारा सा मीठा सा होने लगा है ॥

कुछ डर सा भी भी तो यूं लगने लगा है ।
कि सोया था अब तक वो प्यार जगने लगा है ।।

उमंगें, अंगडाइयां लेने लगी हैं ।
और मन भी भर भर के आने लगा है ॥


कोई क्यों इतने नज़दीक़ आने लगा है ।
क्यों दिन में सपने दिखाने लगा है ॥

क्यों मासूम दिल को धडकाने लगा है ।
क्यों एहसास मीठा वो जगाने लगा है ॥

शायद वो प्यारा सा लगने लगा है ।
या शायद मुझे प्यार होने लगा है ॥

बुधवार, 4 नवंबर 2009

जब तक

जब तक नज़रें थी अपने पर , ख़ुद को ही देखती थी मैं ,
जब से मिली तुम से नज़र, ख़ुद को देखना भूल गई ,

जब तक मिली ना थी तुमसे, खुद को ही जानती थी
जब से मिलना हुआ तुम से, खुद से मिलना भूल गई ,

जब तक रहती थी अपने घर, ख़ुद के साथ ही रहती थी ,
जब से आ गई घर तुम्हारे, खुद के घर का पता भूल गई

जब तक अपनी दुनिया में थी , लौट आती थी अपने ही पास
जब से खोई तुम्हारी दुनिया में, वहां से लौट के आना भूल गई

रविवार, 1 नवंबर 2009

राह दिखलाओ

ध्यान इक धुंद में कहीं कुछ खो गया है !
मन किसी गहरी नींद में ज्यों सो गया है !!

अरे, एक दीप इस घर में कोई तो जला दो !
मेरे सोए हुए मन को ज़रा झकझोर जगा दो !!

अमावस सा यह जीवन क्यों भला यह हो गया है !
ज्ञान मन का क्यों ह्रदय से दूर कही पर खो गया है !!

कोई तो दे के न्योता आज सूरज को जा लिवा लाओ !
खोए हुए ज्ञान को फिर मेरे घर राह दिखलाओ !!

सैलाब मैं कैसे धरोहर सब मेरी क्यों बह गई है !
और लकीरों में भी तो कुछ छिन गयी कुछ रह गयी है !!

कोई करो मेरे लिए कुछ दुआ कि सैलाब बाँधू !
और फिर संयम सहारा ऐसा बने कि मन को साधूँ !!

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

ना तेरे आने की खबर
ना जाने का सबब
दिल कांप उठा है सीने में
जब जब तेरी याद आती है

नए तेरे पाने की ख़ुशी
ना जुदाई का है गम
बस यूंही आन्हें भरा करें हम
जब जब अँधेरे चने लगते हैं

ना हो सके हम ही तेरे
ना ही तू हुआ हमारा
पर तेरा किस और का हो जाने
नहीं इस जिंदगी को गवारा

ना मंजिल है कोई
ना कोई हमराह -इ रकीबा
बस यूंही धारका करे गा
यह दीता उम्र आवारा

ना माय ना साकी ना मैखाना
लाबून तक पहुँचने से पहले ही
छलक गया मेरा पैमाना

बस इतना बता दे मुझे ना खुदा
क्या यही है नसीब मेरा
जलना और जलना बस
जाल जल के ख़ाक हो रहना

की अभी है कुछ बाकि
मेरे हिस्से की
तेरे मैखाने में मेरे खुदा

diwali

दूर से देखा जो सेहर अपना
लगा गगन जमी पर उतर आया है
मिलने को जमीं से

जिधर देखूं रात सजी है
दुल्हन सी
हर दिल टिमटिमा रहा है
रोशन हो प्यार में

ख़ुशी से हर घर महक रहा
हर आंगन जुटा है पूजा में

हर एह्लीज पर
ज्योति आमंत्रण की जगी है

मीठअ सा हो रहा है मन आज
सभी की रूह में मनो रागुले पफूट रहे हूँ

सज सवर्ण कर इंसानियत
मिल रही है गले इक दूजे के

तोफे मिअलं के
ले ले कर बैठे हें सभीi

कुछ ऐसा नजारा बन रहा है
मनो राम राज लौट आया हो आज

हर घर में ख़ुशी के दीप जले हैं
आज दीपावली आई खुशिओं भरी

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

काफी है

जिन्दा रहने के लिए काफी है

इक मुठी आसमान
ताजा हवा के झोंके
झरने का शीतल निर्मल जल
जिन्दा रहने के लिए काफी है

सर पर इक छापरी छोटी सी
इक चूल्हा इक हंडिया

इक थाली इक कटोरी इक गिलास
एक दो मुठ्ठी अनाज
पेट भरने के लिए काफी है


इक चटाई इक बिछोना
इक ओढनी इक तकिया
इक लोरी कुछ मीठे सपने
नींद लेने को काफी है

इस के अलावा जो है सब
इक भेड चाल है बस दिखावा
इक झूठा सच या डरावना ख्वाब
नही जिस के लिए कोई माफ़ी है

इंसान को इंसान होने के लिए
इक दिल दरिया , दया और ज़मीर
इक जेहन सूझवान
इक रूह प्यारी सी काफी है

इस देह के मनमन्दिर में
इक सिंहासन हो हरि का
ज्यों सोने चांदी का रत्न जडाऊ

इक मुकट इक हीरे जरी खडाऊं
जिस की करें पूजा और ध्यान
इबादत में झुका सर
समर्पित जीवन के लिए काफी है

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

मीरा या माया ! दोनो सच !

एक मुखौटा औरों जैसा ...
छिपा है जिसमे चेहरा मेरा ...
आडंबर हैं आधा जीवन
और पाखण्डी मेरा मधुवन
मेरी श्रधा प्यार सभी कुछ
एक छलावा सा यह यौवन ...

ढोंग करूं मैं पूरा पूरा
सच को उघाडूं सदा अधूरा
माहिर हूँ मैं माया रच दूं
संतों का अस्तित्व मिटादूं

पर मेरा सच मेरे अंतर में
मुझ से मिलना हो जो घर में
चले आओ मन के इस तल में
ताला है इस किवाड- द्वार पर
विरला ही चल सके राह पर

यह मीरा का आमोदित घर है
दस्तक है उस पार ब्रह्म की
अन्दर है मंदिर की घंटी
अन्दर गिरजाघर की प्रेयर
और अजान सी टेर यही पर
गुरद्वारे की बानी गूंजे
पलक भीग गयी सुनते सुनते

इस दहलीज़ पर एक अभागन
खुद बहुतेरे रह जाती हूँ
ठिठके से पग रुक जाते हैं
दस्तक देने से पहले ही
लौट लौट फिर फिर आती है ..

मैं मीरा, मैं माया आधी
जगत मुखौटे में उलझी , बांधी
पूरा सच क्या है, सुलझा दो
प्रेम गीत गा मुझे सुला दो !

बुधवार, 30 सितंबर 2009

मेरा सपना

मेरा सपना

अम्बर से हर बूँद बटोरूं
प्रेम - ओस की प्यासी मैं
रुन झुन चलूं गगन मंडल में
बादल की करूं सवारी मैं !!

कतरा कतरा पंखुडियों का
भर अंजुली में इतराऊं
चन्दन सी काया बन जाउं
श्रृद्धा - गीत निरंतर गाऊं !!

प्रेम जगत के पथिक संग ले
प्रेम पंथ पर जल बरसाऊं
मैं मीरा बन नाचूं गाऊं
मै नदिया बन बहती जाऊं !!

मै बनूं वृक्ष और छाया दे दूं
थके हुए झुलसे हृदयों को
बनूं मरहम और जख्म मिटाऊं
गोद बनूं और रोग मिटाऊं !!


भूखे को भोजन बन जाऊं
बनूं सहारा मैं निर्बल का
सिद्धार्थ हृदय बन पीडा हर लूं
फिर मीरा बन नाचूं गाऊं !!

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

हां तुम कुछ ऐसा ही करना

हां तुम कुछ ऐसा ही करना


हां कुछ ऐसा ही करना

अपने नैनों से

अपने कानों से

अपने स्पर्श से



मेरे अस्तित्व में

समाहित हो कर

मेरे भीतर बहकर . रहकर ..

अपनी दृष्टि दे कर मुझको

अपनी शक्ति देकर मुझको

बस जाओ यूं कि ...

हां कुछ ऐसा ही करना


होंठ मेरे हों गीत तुम्हारे

स्वर मेरे हों कंठ तुम्हारे

हर सिहरन, ज्यों तुम छूते हो

हर धडकन, ज्यों तुम बसते हो

बस जाओ तुम यूं मुझमे कि ...

हां कुछ ऐसा ही करना





चेतन में अवचेतन में तुम

जाग्रत में हर सपने में तुम

इस युग में हर जन्मों में तुम

मेरे भीतर बहकर . रहकर ..

अपनी दृष्टि दे दो मुझको

अपनी शक्ति दे दो मुझको


फिर से दे दो मुझे वो शुचिता

स्वच्छ हो सकूं बनूं अमृता

कौमार्य मेरा फिर मुझ मे भर दो

सुहाग बनो तुम सांसे भर दो !

बस जाओ तुम यूं मुझमे कि ...

चेतन से अवचेतन कर दो ...



बस जाओ तुम यूं मुझमे कि ...

हां तुम कुछ ऐसा ही करना

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- Show quoted text -

शनिवार, 12 सितंबर 2009

... तो कोई बात बने

... तो कोई बात बने


पन्नो पर बिखरे पड़े हैं शब्द मेरे यहाँ वहाँ
इन्हें समेट पाऊँ तो कोई बात बने

स्याही सी पहेली है हर सूं जैसे रात का अँधेरा
सहर हो जाने दो तो कोई बात बने

जुल्फों से उलझे उलझे से हैं जज्बात मेरे
इन्हें संवार लूं तो कोई बात बने

आवारा हवा से हुए जाते हैं ख्यालात
उन्हें लगाम दू जरा तो कोई बात बने

ख्वाब सो गये हैं अब गहरी एक नींद में
उन्हें जगा पाऊँ तो कोई बात बने

एहसास सभी उसके बिखरे पड़े हैं बून्दों से
सांसों की माला में उन्हे पिरो लूं तो कोई बात बने

मेरे दिल में छिपा बैठा है बस के कोई चाँद सा
उसे चान्दनी का बना पाऊँ तो कोई बात बने

आ खुद ही मुझ को ढूंढो मुझे सम्भालो
मैं घर को लौट पाऊँ तो कोई बात बने

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

लम्हा लम्हा पल पल छिन छिन

छिन छिन करते रहे तुम से प्यार
पल पल करते रहे बस इन्तजार

लम्हा लम्हा जिंदगी यूहीं कहीं घटती रही
कतरा कतरा हम यूंहीं मरते रहे


टिक टिक करती घडी इंतेज़ार की
देती रही पल पल मेरे सीने में जखम
जार जार रोता रहा एतबार का मंज़र
मर मर के जिये कैसे कोई तज़बीज़ दे मरहम
लम्हा लम्हा जिंदगी यूहीं कहीं घटती रही
कतरा कतरा हम यूंहीं मरते रहे

थम थम वक़्त यूंही सरकता रहा
और हम, कदम दर कदम बढते रहे
जिन्दगी की रोशनी कहीं खोती रही
दम दम सिसकता सा सरकता रह गया यह दम
मर मर के जिये कैसे कोई तज़बीज़ दे मरहम

और तुम्हारी याद में घुटने सा लगा यह दम
छिन छिन मिलने वाली छिन गयी हर ख़ुशी
बूँद बूँद आंसू टपकते औ' सिसकते हम
सिसक सिसक यूं जिंदगी चलती रही


थम थम के भी तो देख लो पल भर जरा
रुक रुक के दीदार दिल का कर तो लो
जरा जरा सा क्यों करो एतबार तुम
भरा भरा है प्यार तो तुम मिल तो लो
थमी थमी सी जिंदगी पल पल गुज़र ही जायेगी
बहने लगेगी प्रीत , प्रीतम मिल तो लो

थम थम के भी तो देख लो पल भर जरा
रुक रुक के दीदार दिल का कर तो लो

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

चांद सलोना प्रीतम जैसा

भूखे की रोटी सा चांद
प्रेमी की महबूबा जैसा
राही का हमराही बनकर
साथ निभाता राह बताता

चांद सलोना प्रीतम जैसा
मेरा मन निस दिन हर जाता

सूरज के घर भिक्षु बनकर
सन्यासी सा वह ज्योत मांगता
बदली संग रास रचाता
नभ में मोहक चित्र बनाता ..

चांद सलोना प्रीतम जैसा
मेरा मन निस दिन हर जाता

दादी नानी का प्यारा चन्दा
कथा कहानी में छा जाता
बचपन में मामा सा प्यारा
अब, प्रेमी सा रूप बनाता

चांद सलोना प्रीतम जैसा
मेरा मन निस दिन हर जाता

प्रीतम प्यारे तुम भी आओ
चन्दा बन मन में बस जाओ
अठखेली कर न तरसाओ
बन के चान्दनी ही छा जाओ

रविवार, 6 सितंबर 2009

अभिनन्दन

अभिनन्दन


सुबह सुबह की महकती हवा
नए जन्मे बच्चे सी ताज़ा
ज्यों धीमे धीमे आँख खोलती
पंख फैलाए चिडिया के नन्हे बच्चे सी
नयी कोपल सी कोमल महकती गुनगुनाती हवा ...


खिली हंसी सी खिली खिली सी धूप घर के आंगन में मीठी मीठी सी धूप
मौसम की शीतलता का पैगाम लाती गुनगुनी लुभावनी धूप ......


चहकती चिडियां
आँगन में रंग बिरंगी फूलों सी बिखरी
पांव पाव फुदकती दाना चुगती चिडिया... संदेसा देती खुले मौसम का ... सुहाने दिनों का ...


नन्हे नन्हे पैरों से भागती फिरती गिलहरियां
कभी कभार बेझिझक बेहिचक से हिरन...
चुपचाप चरते बिचरते आ जाते हैं घर के पिछवाडे में...
लगने लगता है बहार है यहीं कहीं करीब ही
देते हुये एक मुस्कान सी हर दिल में
एक उम्मीद सी हर नजर में
एक होंसला सा हर रूह में

हर दृश्य एक खबर है.. खुशी की खबर
ज्यों आकाशवाणी कर दी हो किसी ने
मन के गुलशन में इन्द्रधनुष छा जाने की
महक उठी हों जीवन की सांसें बागों के फूलों सी जग के रचनाकार ने करवट बदली है ...

नए मौसम का अभिनन्दन है

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

मन्नत

प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

पेडों पर मन्नत की झंडियां
टूटते तारे से दुआएं .. मनौतियां ..
पलक के गिरे बालों से कभी
मन्दिर में घंटियां बांध कर कभी
की है जो मन्नतें
प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

तेरे द्वार नंगे पैरों से सफर तीरथ को जान ..
कभी मंगल का लंघन तो कभी शनि का दान ...
तेरी मन्नत के लिये रोज़े रमज़ान ...
शमा गिरजे मे रोज़ रोज़ तेरे ही नाम...
की है जो मन्नतें
प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

जैसी भी हो मन्नतें आधी अधूरी
तू ही प्रभू है तुझे ही करना है पूरी
मन खरीद ले तू ही मेरा ..
पूरा कर दे इस बाज़ार का दस्तूर
बिक जाऊं तेरे लिए ए मेरे प्रभु...
प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

कौन हूँ में

कौन हूँ मैं ?
धरा हूँ , अस्तित्वहीन ..
या कि, भाव हूँ निराधार ..
विचार हूँ कोई अलिखित सा शायद ...
जिसे जेहन की स्लेट पर न उतारा गया हो अभी ..

माया हूँ या माया का अंश !
भूली भटकी हवा हूँ
बिन राह के मुसाफिर की मानिन्द
या फिर खंडहर हूँ किसी कालातीत ऐश्वर्य का ..

जहां दिखा खुला आसमान सा मन
बस उसी की हो रहती हूँ ...
जहां खीच दे कोई लकीर बह निकलती हूँ उसी और
रस धार बन कर नदी की मानिन्द ..

बरस जाती हूँ जहां कहीं होती है चाह रस की ...
न वजूद है कोई न अस्तित्व न हीं आकार मेरा
माया हूँ या माया का अंश !

ऐ मेरे मसीहा
दिखा दो राह बन जाओ ज्योति
मेरे मन की नैनों की
ले चलो उस पार
जिसे किनारा कहते हैं सब
जहां भर ले कोई अंजुली में मेरे प्रेम को
हो जाऊं धूल से फूल
अर्पण हो रहूँ चरणों में तेरे
तो मुक्ति पाऊँ होने से माया के
इस रूप से ...

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

कैसी है जिंदगी
इक अजूबा है
जब हम हार बैठते हैं
तो कोई कहीं से तिनका मात्र
आ बन जाता है जीवन का सहारा
हाँ नजर चाहिए
उस तिनके को
उस मोके तो प्र्ह्चान्ने के लिएय
ख्वाब सब पुरे होने लगते हैं
सब और हरियाली फेल जाती हेई
खुस्बूएं हर सु मनो बहार
जीवन में आ जाती है
जिंदगी नए सिरे इ जीने को मन होने लगता है
यह मन भी कितना बांवरा
होता है
जो कल थक अपना हो पल में पराया हो जाता है
लाख मानाने पर भी लौट कर नहीं आता
रहता है किसी से संग
साथ निभाता है
पर सिर्फ टीबी तक जब तक
मिलता रहता है
प्यार
जीवन टिका है प्यार की बुनियाद पर
जो जितनी नाजुक उतनी ही मजबूत भी होती है
जिसे दुनिया की कोई ताकत नहीं तोरे सकती और गर टूट जय तो तो कोई जोरे नहीं सकती
प्यार धेरून
पर्बतून समन्द्रून
आकाशून
धरती
सब नक्श्त्रून से भी बढ़ कर मले आप को
मेरी तरफ से
सिर्फ इक कविता के बदले