रविवार, 30 जनवरी 2011

औढनी जब से उडी-उडी
दिल धडके मेरा घडी-घडी

अनजान याद से जुडी-जुडी
मेरी सब राहें मुड़ी मुड़ी

चाहे जुल्फें उलझी-उलझी
पर उलझन सब सुलझी-सुलझी

जज्बात जो थे उखड़े-उखड़े
जो कहते थे मेरे दुखड़े

ध्यान था तब बिखरा-बिखरा
पर अब है मन निखरा-निखरा

जब से तुम से मैं मिली-मिली
कितनी रहती हूँ खिली-खिली

सपने नयनों में यों जुड़े जुड़े
जब से ये नयना लड़े लड़े

गम हुए सभी अब जुदा जुदा
शुक्रिया तेरा ऐ . खुदा खुदा

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

आपकी याद आती रही .. ..
धड़क रही अनगिन धड़कन, पर हरदिन याद तुम्हारी है
साँसे अनगिन आती जाती पर खुशबू एक तुम्हारी है
आंसू की लडियां बह निकली और हर इक बूँद तुम्हारी है
मेरी यादों की दुनिया में, प्रिय प्रीतम याद तुम्हारी है

ज़ज्बातों का दौर चल पडा हर ज़ज्बात तुम्हारे हैं
अहसानों का भार बड़ा और हर अहसास तुम्हारा है
यूं दुनिया में संगी सब, पर सब संगी कहने को हैं
तरस गई अखियाँ तुम बिन, हर सपना सजन तुम्हारा है

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

सैंया मेरे !

सैंया मेरे !
मेरे गीतों के बोल
मुझे लौटा दे
मेरे आंखों के सपने
लौटा दे
लौटा दे मेरी नींदे
रातों की
मेरी सेज मुझे लौटा दे
मेरे सैंया
लेले मेरे दिन,
मेरी रातें भी ले ले
पर
लौटा दे मेरे वो मौसम सुहाने
लौटा दे
लौटा दे
चाहे ले ले दौलत सारी
लूट भले ले सभी खजाने

पर मुझ को मेरी यादें
लौटा दे
लौटा दे
सैंया मेरे

मुझ से साँसे ले ले मेरी
धक धक करता दिल भी ले ले
पर तू मुझको मेरे
अटके प्राण अभी लौटा दे
सैंया मेरे
तू मेरी सब सखियाँ ले ले
ले ले सारे सगे बिराने
लौटा दे तू मीत मेरा
प्रीत मेरी भी तू लौटा दे

मेरे सैंया
चाहे ले ले खुशियाँ सारी
लूट ले होठों की मुस्काने
लौटा दे मेरे दर्दों को
और दुआ भी सब लौटा दे
तुझ बिन नीरस निष्फल जीवन
तू लौटा दे मुझ को आहें
सिसकी आह सभी लौटा दे

सैंया मेरे
तू मेरी सब सखियाँ ले ले
ले ले सारे सगे बिराने
बस इक रिश्ता मेरा प्यार था
तेरे पास है अब लौटा दे

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

दिन है पर किरणे बुझी बुझी
हवा भी बोझिल थकी थकी
मायूस पेड़ भी झुके झुके
पत्ते कुम्हलाए झरे झरे
फूल उनींदे थके थके
वीरानापन, जग भर पसरा
सन्नाटा ही सन्नाटा
दिन ऊंघ रहे गलियारों में
रातें उनींदी जगी जगी
बिसर गए प्रीतम तुम जब से
मौसम कितना वीराना है ..

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

न धडकन है टूटी,

न दिल ही है बिछुडा ।

ज़रा सी ये दूरी
थी थोडी ज़रूरी ।


वरना ये सासें भी

ज़ख्मी हो जातीं ।

तेज़ हो चली थी,

ठहर न रही थी ।



ये थोडा सा संयम

और थोडा सा विरहा ।

मुझे थाम लेगा
मुझे राह देगा ।


राहें थी प्यारी

मुझे यूं लुभाती

भटक मैं चला था
ठहर न रहा था ।


मेरी थी गलती

तो सज़ा मैं ही मांगूँ

कष्ट जो तुम्हे हो

तो क्षमा भी मैं मांगूँ



मुझे माफ करना

खता भूल जाना

जो राहें पुरानी

उसी राह जाना ।



पल जो गुज़ारे

संग संग तुम्हारे

है मेरी अमानत

उसे न भुलाना ।

शनिवार, 19 जून 2010

धरकन इक छोटी सी बिछड़ी दिल से कुछ ऐसे
उंगली जो थमी थी बरसो से छूट गई हो जैसे

नन्ही सी आन्सो की बूँद पलकों से टपकी कुछ ऐसे
दर्द का सह्लाब बह निकला हो जैसे

वक़्त के हाथों से लम्हा इक गिरा यूं
पछता रही हूँ आज भी इक यह हुआ कयूं
कतरा कतरा जिंदगी रोई कुछ ऐसे
तिल तिल कर जले दिए में लौ जैसे

सान्सून की लड़ी से सांस इक गिर गई कयूं
आखिर तुम मुझे छोड़ कर चल दिए कयूं

याद इक छुट गई पीछे कहीं सदियूं से परे
जब से रहने लगे हो तुम हम से कुछ परे परे

शनिवार, 12 जून 2010

मिली नही

मिली नही नजर कि बस जुबान बन गई
आवाज़ का खयाल ही तो कान बन गई

ओंठ कपकपा उठे पर दिल न कह सका
ये कैसी शर्म है कि जो गुलाल बन गई

शरारतों में, छुअन का ख्याल बस गया
एहसास छुप सका न, बेनक़ाब बन गई

बेबाक चले आये हो इस कदर जो सपन में
आंखे मेरी, ज़माने का हर ज़वाब बन गई

जाओ चले जाओ चुपके से पलक से
सहर होने को है, और ये बेहिज़ाब हो गई

बस गए हो दिल में, तो ताज़िन्दगी रहो
ये घर है अब तुम्हारा, मैं बेमकान हो गई

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

न जाग पाऊं कभी

तो जगा देना मुझे

पाप हो जाये अगर

तो सज़ा देना मुझे


अंधे हैं हम सब
इस अंधेर नगरी में
ठोकर खा कर गिर पडून
तो हाथ बाधा उठा देना मुझे


सोया है मन सो गई आत्मा
दुनिया की भीढ़ में खोया अस्तित्व
झाक्जोर कर

जगा देना मुझे


हे प्रभु,

उंगली पकड कर

तुम मुझे अवलम्ब दे दो

ठगिनी बहुत,

माया जगत की,

ये नचा दे ना मुझे ....

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

खेल रही मृगछौने सी कमरे कमरे धूप,

चिडिया चीं चीं कर उठी खिला धूप का रूप ॥

खिला धूप का रूप बसंती मौसम आया,

किस बाला ने किस कूंची से इसे सजाया ॥

रूप अनोखा सज उठा छुप गया रूप चितेरा
मन वीणा भी बज उठी, कण कण हुआ सवेरा ॥

छम छम करती देखो होथूं पर मुस्कान चली आई
चमक चांदनी सी अखियूं में पहचान चली आई

रुन झुन करती बागो में लो हर काली आई
झोली भर खुशीआं ले में भी तेरी गली आई

घर आँगन में रौनक यह यूं भली आई
लो आज बसंती हवा यह संदेसा लाइ

खूब खिलो हसो महको सब आज बसंत ऋतू आई

सोमवार, 15 मार्च 2010

तेरी याद !!

तेरी याद !!


नंगे पावँ

बिन आहट

चुप चाप चली आती है


सुब्ह सवेरे

मेरी नीद के द्वारे पर

दस्तक दे मुझे जगाती है


मेरी अंखियों से

चुपके से

नींद चुरा ले जाती हे


मन के वसूने कोने में

मीठी सी

गुदगुदी सी कर जाती हे


कानों में धीरे से

प्यार के बोल

फुसफुसाती है


कर आलिंगन

चूम गले को

बालों को सहलाती है


हर पल दिल को

और रूह को

नाजुक सा छू जाती है


कभी सिरहाने बैठ देखती

कभी जगा, मुझ से बतियाती है


तेरी याद



दिन भर यूं ही

मेरा साथ निभाती है

फिर थक कर

मेरे तकिए पर

सर रख रात बिताती है


नींद उनींदी,

याद रात भर

सुख सपने दिखलाती है
फिर सुबह सवेरे

चुपके से आ

सहला मुझे जगती है

जब तुम जाते हो

पल पल भारी

यादें बहुत सताती है

जाने को तो तुम जाते हो

याद यहीँ रह जाती हैं



मुझको बहुत सताती है ।



नंगे पावँ

बिन आहट

जाती हैं - आती है ।

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

साजन की धडकन का गीत

साजन की धडकन का गीत



बन के धड़कन, तेरे दिल में, धडका करूँ

रूह बन कर, तेरे तन में, बसती रहूँ ॥



बन के दृष्टि, समाऊँ, तेरे नैन में
तेरी नज़रों से, दुनिया, यूँ देखा करूँ ॥



मैं जो छू लूं, तो सिहरन, तेरी बन रहूँ

तू जो छू ले, तो निस दिन, ही महका करूँ ॥



तू जो बोले, तो निकले, मेरे बोल ही

जब भी बोलूँ, तेरी बातें, बोला करूँ ।।



पास बैठूँ, तेरे तो, सखा भाव से,

तेरी संगी बनूं और सखी हो रहूँ ॥

औढे तू जो, अगर, बन जाउँ औढनी
बिछ जाउँ, तेरे तल, बिछौना बनूँ ॥

तू चले तो, चरण में खडाऊ बनूँ

तेरी सांसें बनूं, संग हमेशा रहूँ ।।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

कभी जो फुरसत हो तुम्हे

कभी जो फुरसत हो तुम्हे

दिल के दरवाज़े पर दस्तक देती है, सहमी सी इक धडकन हर रोज़
सूनी अखियाँ बेबस सी, करती ही रहती हैं तुम्हारा इन्तजार हर रोज़


कभी जो फुरसत हो और सुन पाओ उस दस्तक को तो झांको
दिल की आंखों के झरोखों से तुम पाओगे मेरी बेकसी हर रोज़


बस देख लेना नज़र भर , इस अकेली सी धडकन को
जो सूनी राहों में करती ही रहती है इंतजार हर पल हर रोज़


इक नजर प्रेम भरी जो मिल जाए, जी जायेगी सांसे, थिरक उठेगी
जा बसेगी दिल में, धडकेगी तुम्हारे तन मन में, हर पल हर रोज़


बस ही गए हो जो आंखों में, तो न जाओ इस दिल से भी कभी
बसे रहो धडकनों में - ख्वाबों में - ख्यालों में, यूं ही पल पल हर रोज़

रविवार, 22 नवंबर 2009

कैसा यह अहसास मुझे अब !!

एहसास सा यह होने लगा है ।
करीब मेरे कोई आने लगा है ।।

दिल-ओ-जाँ से जैसे कि चाहने लगा है ।
कुछ प्यारा सा मीठा सा होने लगा है ॥

कुछ डर सा भी भी तो यूं लगने लगा है ।
कि सोया था अब तक वो प्यार जगने लगा है ।।

उमंगें, अंगडाइयां लेने लगी हैं ।
और मन भी भर भर के आने लगा है ॥


कोई क्यों इतने नज़दीक़ आने लगा है ।
क्यों दिन में सपने दिखाने लगा है ॥

क्यों मासूम दिल को धडकाने लगा है ।
क्यों एहसास मीठा वो जगाने लगा है ॥

शायद वो प्यारा सा लगने लगा है ।
या शायद मुझे प्यार होने लगा है ॥

बुधवार, 4 नवंबर 2009

जब तक

जब तक नज़रें थी अपने पर , ख़ुद को ही देखती थी मैं ,
जब से मिली तुम से नज़र, ख़ुद को देखना भूल गई ,

जब तक मिली ना थी तुमसे, खुद को ही जानती थी
जब से मिलना हुआ तुम से, खुद से मिलना भूल गई ,

जब तक रहती थी अपने घर, ख़ुद के साथ ही रहती थी ,
जब से आ गई घर तुम्हारे, खुद के घर का पता भूल गई

जब तक अपनी दुनिया में थी , लौट आती थी अपने ही पास
जब से खोई तुम्हारी दुनिया में, वहां से लौट के आना भूल गई

रविवार, 1 नवंबर 2009

राह दिखलाओ

ध्यान इक धुंद में कहीं कुछ खो गया है !
मन किसी गहरी नींद में ज्यों सो गया है !!

अरे, एक दीप इस घर में कोई तो जला दो !
मेरे सोए हुए मन को ज़रा झकझोर जगा दो !!

अमावस सा यह जीवन क्यों भला यह हो गया है !
ज्ञान मन का क्यों ह्रदय से दूर कही पर खो गया है !!

कोई तो दे के न्योता आज सूरज को जा लिवा लाओ !
खोए हुए ज्ञान को फिर मेरे घर राह दिखलाओ !!

सैलाब मैं कैसे धरोहर सब मेरी क्यों बह गई है !
और लकीरों में भी तो कुछ छिन गयी कुछ रह गयी है !!

कोई करो मेरे लिए कुछ दुआ कि सैलाब बाँधू !
और फिर संयम सहारा ऐसा बने कि मन को साधूँ !!

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

ना तेरे आने की खबर
ना जाने का सबब
दिल कांप उठा है सीने में
जब जब तेरी याद आती है

नए तेरे पाने की ख़ुशी
ना जुदाई का है गम
बस यूंही आन्हें भरा करें हम
जब जब अँधेरे चने लगते हैं

ना हो सके हम ही तेरे
ना ही तू हुआ हमारा
पर तेरा किस और का हो जाने
नहीं इस जिंदगी को गवारा

ना मंजिल है कोई
ना कोई हमराह -इ रकीबा
बस यूंही धारका करे गा
यह दीता उम्र आवारा

ना माय ना साकी ना मैखाना
लाबून तक पहुँचने से पहले ही
छलक गया मेरा पैमाना

बस इतना बता दे मुझे ना खुदा
क्या यही है नसीब मेरा
जलना और जलना बस
जाल जल के ख़ाक हो रहना

की अभी है कुछ बाकि
मेरे हिस्से की
तेरे मैखाने में मेरे खुदा

diwali

दूर से देखा जो सेहर अपना
लगा गगन जमी पर उतर आया है
मिलने को जमीं से

जिधर देखूं रात सजी है
दुल्हन सी
हर दिल टिमटिमा रहा है
रोशन हो प्यार में

ख़ुशी से हर घर महक रहा
हर आंगन जुटा है पूजा में

हर एह्लीज पर
ज्योति आमंत्रण की जगी है

मीठअ सा हो रहा है मन आज
सभी की रूह में मनो रागुले पफूट रहे हूँ

सज सवर्ण कर इंसानियत
मिल रही है गले इक दूजे के

तोफे मिअलं के
ले ले कर बैठे हें सभीi

कुछ ऐसा नजारा बन रहा है
मनो राम राज लौट आया हो आज

हर घर में ख़ुशी के दीप जले हैं
आज दीपावली आई खुशिओं भरी

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

काफी है

जिन्दा रहने के लिए काफी है

इक मुठी आसमान
ताजा हवा के झोंके
झरने का शीतल निर्मल जल
जिन्दा रहने के लिए काफी है

सर पर इक छापरी छोटी सी
इक चूल्हा इक हंडिया

इक थाली इक कटोरी इक गिलास
एक दो मुठ्ठी अनाज
पेट भरने के लिए काफी है


इक चटाई इक बिछोना
इक ओढनी इक तकिया
इक लोरी कुछ मीठे सपने
नींद लेने को काफी है

इस के अलावा जो है सब
इक भेड चाल है बस दिखावा
इक झूठा सच या डरावना ख्वाब
नही जिस के लिए कोई माफ़ी है

इंसान को इंसान होने के लिए
इक दिल दरिया , दया और ज़मीर
इक जेहन सूझवान
इक रूह प्यारी सी काफी है

इस देह के मनमन्दिर में
इक सिंहासन हो हरि का
ज्यों सोने चांदी का रत्न जडाऊ

इक मुकट इक हीरे जरी खडाऊं
जिस की करें पूजा और ध्यान
इबादत में झुका सर
समर्पित जीवन के लिए काफी है

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

मीरा या माया ! दोनो सच !

एक मुखौटा औरों जैसा ...
छिपा है जिसमे चेहरा मेरा ...
आडंबर हैं आधा जीवन
और पाखण्डी मेरा मधुवन
मेरी श्रधा प्यार सभी कुछ
एक छलावा सा यह यौवन ...

ढोंग करूं मैं पूरा पूरा
सच को उघाडूं सदा अधूरा
माहिर हूँ मैं माया रच दूं
संतों का अस्तित्व मिटादूं

पर मेरा सच मेरे अंतर में
मुझ से मिलना हो जो घर में
चले आओ मन के इस तल में
ताला है इस किवाड- द्वार पर
विरला ही चल सके राह पर

यह मीरा का आमोदित घर है
दस्तक है उस पार ब्रह्म की
अन्दर है मंदिर की घंटी
अन्दर गिरजाघर की प्रेयर
और अजान सी टेर यही पर
गुरद्वारे की बानी गूंजे
पलक भीग गयी सुनते सुनते

इस दहलीज़ पर एक अभागन
खुद बहुतेरे रह जाती हूँ
ठिठके से पग रुक जाते हैं
दस्तक देने से पहले ही
लौट लौट फिर फिर आती है ..

मैं मीरा, मैं माया आधी
जगत मुखौटे में उलझी , बांधी
पूरा सच क्या है, सुलझा दो
प्रेम गीत गा मुझे सुला दो !

बुधवार, 30 सितंबर 2009

मेरा सपना

मेरा सपना

अम्बर से हर बूँद बटोरूं
प्रेम - ओस की प्यासी मैं
रुन झुन चलूं गगन मंडल में
बादल की करूं सवारी मैं !!

कतरा कतरा पंखुडियों का
भर अंजुली में इतराऊं
चन्दन सी काया बन जाउं
श्रृद्धा - गीत निरंतर गाऊं !!

प्रेम जगत के पथिक संग ले
प्रेम पंथ पर जल बरसाऊं
मैं मीरा बन नाचूं गाऊं
मै नदिया बन बहती जाऊं !!

मै बनूं वृक्ष और छाया दे दूं
थके हुए झुलसे हृदयों को
बनूं मरहम और जख्म मिटाऊं
गोद बनूं और रोग मिटाऊं !!


भूखे को भोजन बन जाऊं
बनूं सहारा मैं निर्बल का
सिद्धार्थ हृदय बन पीडा हर लूं
फिर मीरा बन नाचूं गाऊं !!