मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

जिंदगी

जिंदगी


बहुत खूब और अजीब होती है जिंदगी

रहती तो है करीब पर न होती है कभी

चलती है साथ साथ साए सी ज़िन्दगी ।
मगर बहुत दूर सी लगती है जिंदगी ॥

आज इस के पास है तो कल उस के पास ।

मेरा ही कुछ गुनाह कि मेरी हुई न जिंदगी

क्यूँ न कर सकी वफ़ा मुझ से ही मेरी जिंदगी
कर के वादा भूल कयों गई मुझे ये जिंदगी



देखना रूठ ना जाना कहीं मुझ से एह जिंदगी

यूं हिकभी जो मूह फेर लिया तुने
तो मौत के घर चली जाए गी यह डोली मेरी
एह जिंदगी

मुठियाँ


मुठियाँ

कस के बंद कर लेने से
ना थाम सकते हैं हम
समय को ना यादूं को
नहीं ही दिन की धुप को
अपने साए
चांदनी की खुशबू
बूँदें बरिशूं की
उठती गिरती लहरून की रवानगी को
चमकती बिजलियूँ को
सपनो को
ख्यालूँ को
सोच को

बस समंदर किनारे की बालो
सामान होते हैं यह सब
जितना स्टे हैं हम
मुथियूं को
उतना ही खोते हैं
चले छोड़ दें ढीली कर देखें यह
मुठियाँ
सारा जहाँ हमारा हो रहे गा
ना कुछ पाने कीछा ना खूने का डर

मुठियाँ खोल दो सभी
मुठियाँ

यूं ही नहीं

कभी हाथूं से नहीं
सान्सून से नहीं
दिल के तारून से बंधी हैं
गांठे हैं यह पक्की
यदुन की मोहताज नहीं हैं
रित सी नहीं हैं
जो खिसक जाएंगी बंद मुथिओं से
सदियूं से पहले युगून से परे
जनामून से बढ़ कर
होते हैं यह रिश्ते
मिलन जो आत्माओं के हॉटइ हैं
बाद्लूँ की ओट से
झांकती यह जो बिज्लोइयाँ हैं
यह हैं साक्षी हमारे ओने के
हमारे साथ की
कहती हैं यह कहानियां
यूं ही नहीं होते हैं यह मन के रिश्ते


क्यूं ,
इतनी पीढ़ा
इतनी उदासी
कयूं
इतना खींचते हो
खुद से लड़ते हो
झगड़ते हो
कयूं
हमेशा सीधे सीधे देखते हो
खुद को मंजिल को

... ये पीड़ा ये परेशानी
ज़रा सी बात है समझो ......

तुम्हारे साथ हैं सूरज
तुम्हारे साथ बरसातें

चमकती चोटीयाँ हैं
और हैं बातें जहानो की
बहुत से चाहने वालूं की

ज़रा देखो नज़ारे ढूँढ़ते हैं
जिंदगी तुममे

इन्हें बाहों में भर लो और
छू लो हर सितारे को

तुम्हआरी उम्मीदों से
रोशन कितनी राहें हैं

थक कर कहीं पे बैठ न जाना मेरे साथी

उठो थाम लो अंगुली खुद की
बदलून के उस पार
है एक जहां
जहां होंगे सब सपने साकार

बुधवार, 2 नवंबर 2011

दीवाली या खुदा का नूर

आज ऐसा ही कुछ एहसास हो रहा है मुझे भी दीपावली के इस शुभ अवसर पर
खुदा भी आसमान से जब जमीन पर देखता होगा
तो मेरे सेहर को देख कुछ ऐसा ही कहे गा

देखा जो दूर से आज शर अपना
लगा खुदा खुद उतर आया है जमीन पर आज
हर सू उस का ही नूर छाया है आज
दुल्हन सी सजी है रात अमावास की आज
मांग सितारून से सजी है उस की आज
आँचल में कृपा बरस रही लखमी की आज
ओन्थून पे मुस्कान दिल में तम्नाएय हज़ार
हर देहलीज पर ज्योति आमंत्रण की जली है आज
थाल भरे हैं खुशियूं से
लड्डू फूट रहे आँगन आँगन आज
मीठा सा हो रहा है यह मन भी आज
रूह भी तो देखोरोषण है कितनी आज
तोहफे पयार से मिल रहे हैं गले आज
रौशनी मिठाई खुशीआं पठाखे मिलन तोफे और ढेर सारा पयार
लाया है दिवाली का त्योहार आज
आओ मिल कर ख़ुशी मनाएं गले मिलें खूब पटाखे बजाएं
लो आई दिवाली आज लो आई दिवाली आज
कविता ना लिखी ही जाती है ना कही
बस होने लगती है खुद ब खुद
जब जब
खुदा के पाक हाथ छू जाते हैं
किसी जबीं को
थाम लेते हैं जेहन की अंगुली
कर के रूह के पंखून पर सवार
ले जाए ब्रह्माण्ड के उस पार
खुद ही खुदा
तो उस के नक़्शे प् ही हो रहते हैं
किसी कविता के हर्फ़
और रह रह कर उभर आते हैं जेहन में
उत्तर आते हैं किसी की जुबानी
कविता बन बन

शुक्रवार, 10 जून 2011

सजा लो पलकों पर आंसू बना
>झंकार बना रख लो अपने साजून की तारून पर
>कर लो शामिल अपने गीतूनमें
>बना लो मुझे अपने बोल
> चाहे गम ही अपना समझ
>बसा लो दिल में
> बिठा लो अपनी यदुन की कतारों में कभी
>रख लो अपनी धर्कनूमें
>रूह से चिपका लो मुझे
>आपने स्पर्शून्में से कुछ सपर्श बाँट लो मेरे साथ
> रख लोअपने भीतर कहींभी
>टीस सीने की चुन्हन चाहे हो रहूँ मन की
>देदो ना थोड़ी जगह अपनी जिन्दी में मुझे भी
>की जी जाऊं में पल दो पल
>साथ तुम्हारे
>नजर भर देख लो एक बार जो
>जी जाऊं में युगून तह यूंही
>--
>नजरूं से उतर कर
> चल के के पाऊँ पाऊँ
>धर्कनू पर हो कर सवार
>लगाम ले कर हाथूं में
>दौराते घोड़े अपनी धरकनो के
>छू लो मुझे
>थाम लो मेरे हाथ आज
>समेट कर सब अपने जज़्बात
>रोक लो साँसे अपनी
>खो जाओ
>सपनो में
>और आ जाओ ..........................
>
>मेरे दिल के आगोश में ............
>
> बस रहो
> कर लो घर इसे अपना
> की आज घर पर कोई नहीं
>बस में और तुहारी यादें
>खेल रही हैं आंखमिचोली
>
>अब चले भी आओ ना सताओ
>की थक गई हैं साँसे मेरी
>अब नहीं तक सकती और राह तुम्हारी
>मेरी नजर कमजोरे हो चली
>
> किवाड़ भी तक तक ऊंघने लगा है
> दस्तक को भी ऊंचा सुनने लगा है
>
>चले आओ अब तो
>की मूँद पाऊँ मैं यह पलकें थकी थकी
इक टीस दिल में उठती रहे गी
>कमी तुम्हारी खलती रहे गी
>
>सर्द हवाएं तीखी दोपहरी
>तेरी याद यूंही बनी रहे गी
>
>सावन की बद्री हवाएं पतझर की
>साथ मेरे यूं ही चलती रहे गी
>
>वोह चाय की प्याली
>वोह सिगरेट बुझी
>तेरे जाने की खबर देती रहे गी
>
>सिरहाने खामोश
>वोह सिलव्तें चदर की
> कहानी रात खुद अपनी कहे गी
>
>वीरानी गलियां
> खामोश रातें
> चांदनी यूंही एकेली पड़ी रहे गी
>
>

रविवार, 1 मई 2011

क्या यही प्रीत है

जो मद्धिम हवा के झोंके सी

जो झरने के मीठे पानी सी

जो प्रीत के आंसू सी खारी

जो श्रम-संचित बूँद पसीने की !

क्या यही प्रीत है ??

जो खुशबू का एहसास लिए

जो चाहत की मीठी प्यास लिए

मिलने का इन्तजार लिए

नज़दीकी का एहसास लिए

क्या यही प्रीत है ??

जो वियोग डर से कम्पित

जो तन्हाई भय से शंकित

वो रुनझुन से करती छा जाती

अकस्मात ही आ जाती

क्या यही प्रीत है ??

वो बने काव्य, और भा जाए

तो प्यार न कैसे हो जाए

डर है ये टूट न जाए लड़ी

जिससे मेरी हर याद जुडी

कविता है बस्ती है मन में

अटखेली करती मन आँगन में

क्या यही प्रीत है ??


तेरी याद में

याद तेरी बस आती है

दिल की धडकन बढ़ जाती है

चित चैन कहीं खो जाता है

जब तू ख्याल में आता है |

स्पर्श सभी जग जाते हैं

आँखें भी नम हो जाती हैं

आँखों से आंसूं झरते हैं

ज्यों मन का ताप पिघलता है

पल-छिन महीने बरस-बरस !

दिल मिलने को गया तरस !

पलक पांवड़े बिछा राह में

सदियों से मन की एक पुलक !

चाँदनी रात की चादर पर

कदम कदम हम बढ़ते हैं

मंजर, सफ़ेद पन्नो पर ज्यों

कुछ हरफ –ब-हरफ उभरते हैं

कि, यकायक ही हर सु

कविता सी बिखरने लगती है

जिसे समेटे आँचल में हम

दिन रात मचलते फिरते हैं

यही धरोहर छुपा जगत से

सीने से लगाए फिरते हैं

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

मैं, तेरी छाया !!

शीतकाल की मद्धिम धूप बनूँ और तुझ पर मैं छा जाऊं

मैं बनूँ ग्रीष्म में छांव, तुझे रह रह कर शीतल कर जाऊं

बन जाऊं बदरिया सावन की, बरसूं मन पर घनघोर पिया

चमकूँ यादों की बिजली बन, ‘बाती’ मैं - तू मेरा ‘दिया’

बन जाऊं शीतल मंद पवन, तेरा तन मन दरसूं-परसूं

बन जाऊं बहती नदिया, कि बन लहरे, मैं हरदम हरसूँ

जल बन कर सारी प्यास बुझादूं तेरे तन मन के उपवन की

तितली बन तुझ पर मंडराऊं, हो जाऊं तेरे मधुबन की

क्या यही प्रीत है

जो मद्धिम हवा के झोंके सी

जो झरने के मीठे पानी सी

जो प्रीत के आंसू सी खारी

जो श्रम-संचित बूँद पसीने की !

क्या यही प्रीत है ??

जो खुशबू का एहसास लिए

जो चाहत की मीठी प्यास लिए

मिलने का इन्तजार लिए

नज़दीकी का एहसास लिए

क्या यही प्रीत है ??

जो वियोग डर से कम्पित

जो तन्हाई भय से शंकित

वो रुनझुन से करती छा जाती

अकस्मात ही आ जाती

क्या यही प्रीत है ??

वो बने काव्य, और भा जाए

तो प्यार न कैसे हो जाए

डर है ये टूट न जाए लड़ी

जिससे मेरी हर याद जुडी

कविता है बस्ती है मन में

अटखेली करती मन आँगन में

क्या यही प्रीत है ??


बुधवार, 2 मार्च 2011

यादों का झरोखा


जब भी किवाड़ के पीछे से,
झाँका किए हैं हम ..........

मिली हमे अपने आँगन में
बिखरी सी खुशियां छम छम ....
मुठी भर था आसमा
थाली भर थी रौशनी ...
भगोना भर भर चांदनी ...

तारों की छांह कटोरी भर-भर
ओस की बूँदें चम्मच भर-भर ...
मिली हमे अपने आँगन में
बिखरी सी खुशियां छम छम ...
खिड़की के पीछे से,
जब भी झाँका किए हैं हम ..........
पाए, झौखे सर्द-गर्म से
झरते पत्तों का दीवानापन .....
बहारेबसंत भी थोडा थोड़ा
बरखा भी भीगी भीगी सी ......
ज्यों जुगनू सी कोई कोई
यादें आएं, खोई खोई सी .......

और झरोखे के कौने से,
जब भी झाँका किए हैं हम ..........

देखि हैं कुछ मीठी मीठी बातें
कुछ खाते खाते पल
कुछ मिलन की खुशियाँ
जुदाई का ढेर सारा गम ........

जब भी कभी झाँका है हमने
किसी द्वार की आड़ ......
पाया हमने इंतजार ही
और प्यार की प्यास ....

फिर जब अंत में झांका हमने
अपने ही गिरहबान में
देखे हमने रेशमी रिश्ते
और वो ढलका ढलका आँचल ...
वो अखियों का शरमाना |
वो मिलन के पहले पल ...
वो रूठना मनाना |

जब भी कभी चुपके से बैठ
सोचा किए हम ...
तुम ही तुम हो हर सू
वो तुम ही हो
हर पल हर दिन ...

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

घनी इक छांव से हो तुम


सुहानी शाम से हो तुम
बसंत बहार से हो तुम

घनी इक छांव से हो तुम
सुकूँ-आराम से हो तुम


मधुर संगीत से हो तुम
मधुर झंकार से हो तुम

मधुर मुस्कान से हो तुम
मेरी तो शान से हो तुम

कोई सपना सा हो तुम
मेरा अपना सा हो तुम

मेरे दिल की धडकन तुम

मेरी सांसों की सरगम तुम


अनबुझी-प्यास से हो तुम

अनकही-आस से हो तुम

मेरी तो जिंदगी हो तुम
मेरी तो जान ही हो तुम ........

एक उदास सांझ ...


पतझड़ के सूखे पेड

मुरझाए फूल

पथरीली चट्टान

ठहरे झील के पानी से

रात अमावस की

कडकती दोपहरी बैशाख की

तूफानी हवाएँ

वीरान फिज़ाएँ

इतनी खामोशी

कभी उदासी हो नाम हमारा ...

कभी कहानी

अधूरी सी

तो कभी कविता

अनकही

टूटते सपने कहीं

नाउम्मीदी कभी

जो भी हों

जहां भी हों

हम

दुःख ही होते हैं

दुःख ही देते हैं

क्या उदासी ही है नाम हमारा ?

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

परछाई ...

कभी तू झरना झर-झर प्यार
कभी बासंती - मस्त बयार
कभी परबत सा ठहरा ठोर
कभी सन्नाटा हर ओर
कभी तू निखरी निखरी धूप
कभी चाँदनी सा मृदु रूप

कभी तू तितली वन उपवन
कभी भंवरे की सी गुनगुन

कभी कश्ती कभी पतवार
कभी साहिल कभी मझधार
कभी पतझड़ कभी बहार
कभी इस पार कभी उस पार
में हूँ जो तेरी परछाई ...
तू जिस दिस जाए मैं जाती हूँ
जिस रंग में तू रंग ले साजन
में वैसी ही हो जाती हूँ

रविवार, 30 जनवरी 2011

औढनी जब से उडी-उडी
दिल धडके मेरा घडी-घडी

अनजान याद से जुडी-जुडी
मेरी सब राहें मुड़ी मुड़ी

चाहे जुल्फें उलझी-उलझी
पर उलझन सब सुलझी-सुलझी

जज्बात जो थे उखड़े-उखड़े
जो कहते थे मेरे दुखड़े

ध्यान था तब बिखरा-बिखरा
पर अब है मन निखरा-निखरा

जब से तुम से मैं मिली-मिली
कितनी रहती हूँ खिली-खिली

सपने नयनों में यों जुड़े जुड़े
जब से ये नयना लड़े लड़े

गम हुए सभी अब जुदा जुदा
शुक्रिया तेरा ऐ . खुदा खुदा

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

आपकी याद आती रही .. ..
धड़क रही अनगिन धड़कन, पर हरदिन याद तुम्हारी है
साँसे अनगिन आती जाती पर खुशबू एक तुम्हारी है
आंसू की लडियां बह निकली और हर इक बूँद तुम्हारी है
मेरी यादों की दुनिया में, प्रिय प्रीतम याद तुम्हारी है

ज़ज्बातों का दौर चल पडा हर ज़ज्बात तुम्हारे हैं
अहसानों का भार बड़ा और हर अहसास तुम्हारा है
यूं दुनिया में संगी सब, पर सब संगी कहने को हैं
तरस गई अखियाँ तुम बिन, हर सपना सजन तुम्हारा है

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

सैंया मेरे !

सैंया मेरे !
मेरे गीतों के बोल
मुझे लौटा दे
मेरे आंखों के सपने
लौटा दे
लौटा दे मेरी नींदे
रातों की
मेरी सेज मुझे लौटा दे
मेरे सैंया
लेले मेरे दिन,
मेरी रातें भी ले ले
पर
लौटा दे मेरे वो मौसम सुहाने
लौटा दे
लौटा दे
चाहे ले ले दौलत सारी
लूट भले ले सभी खजाने

पर मुझ को मेरी यादें
लौटा दे
लौटा दे
सैंया मेरे

मुझ से साँसे ले ले मेरी
धक धक करता दिल भी ले ले
पर तू मुझको मेरे
अटके प्राण अभी लौटा दे
सैंया मेरे
तू मेरी सब सखियाँ ले ले
ले ले सारे सगे बिराने
लौटा दे तू मीत मेरा
प्रीत मेरी भी तू लौटा दे

मेरे सैंया
चाहे ले ले खुशियाँ सारी
लूट ले होठों की मुस्काने
लौटा दे मेरे दर्दों को
और दुआ भी सब लौटा दे
तुझ बिन नीरस निष्फल जीवन
तू लौटा दे मुझ को आहें
सिसकी आह सभी लौटा दे

सैंया मेरे
तू मेरी सब सखियाँ ले ले
ले ले सारे सगे बिराने
बस इक रिश्ता मेरा प्यार था
तेरे पास है अब लौटा दे

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

दिन है पर किरणे बुझी बुझी
हवा भी बोझिल थकी थकी
मायूस पेड़ भी झुके झुके
पत्ते कुम्हलाए झरे झरे
फूल उनींदे थके थके
वीरानापन, जग भर पसरा
सन्नाटा ही सन्नाटा
दिन ऊंघ रहे गलियारों में
रातें उनींदी जगी जगी
बिसर गए प्रीतम तुम जब से
मौसम कितना वीराना है ..

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

न धडकन है टूटी,

न दिल ही है बिछुडा ।

ज़रा सी ये दूरी
थी थोडी ज़रूरी ।


वरना ये सासें भी

ज़ख्मी हो जातीं ।

तेज़ हो चली थी,

ठहर न रही थी ।



ये थोडा सा संयम

और थोडा सा विरहा ।

मुझे थाम लेगा
मुझे राह देगा ।


राहें थी प्यारी

मुझे यूं लुभाती

भटक मैं चला था
ठहर न रहा था ।


मेरी थी गलती

तो सज़ा मैं ही मांगूँ

कष्ट जो तुम्हे हो

तो क्षमा भी मैं मांगूँ



मुझे माफ करना

खता भूल जाना

जो राहें पुरानी

उसी राह जाना ।



पल जो गुज़ारे

संग संग तुम्हारे

है मेरी अमानत

उसे न भुलाना ।

शनिवार, 19 जून 2010

धरकन इक छोटी सी बिछड़ी दिल से कुछ ऐसे
उंगली जो थमी थी बरसो से छूट गई हो जैसे

नन्ही सी आन्सो की बूँद पलकों से टपकी कुछ ऐसे
दर्द का सह्लाब बह निकला हो जैसे

वक़्त के हाथों से लम्हा इक गिरा यूं
पछता रही हूँ आज भी इक यह हुआ कयूं
कतरा कतरा जिंदगी रोई कुछ ऐसे
तिल तिल कर जले दिए में लौ जैसे

सान्सून की लड़ी से सांस इक गिर गई कयूं
आखिर तुम मुझे छोड़ कर चल दिए कयूं

याद इक छुट गई पीछे कहीं सदियूं से परे
जब से रहने लगे हो तुम हम से कुछ परे परे

शनिवार, 12 जून 2010

मिली नही

मिली नही नजर कि बस जुबान बन गई
आवाज़ का खयाल ही तो कान बन गई

ओंठ कपकपा उठे पर दिल न कह सका
ये कैसी शर्म है कि जो गुलाल बन गई

शरारतों में, छुअन का ख्याल बस गया
एहसास छुप सका न, बेनक़ाब बन गई

बेबाक चले आये हो इस कदर जो सपन में
आंखे मेरी, ज़माने का हर ज़वाब बन गई

जाओ चले जाओ चुपके से पलक से
सहर होने को है, और ये बेहिज़ाब हो गई

बस गए हो दिल में, तो ताज़िन्दगी रहो
ये घर है अब तुम्हारा, मैं बेमकान हो गई

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

न जाग पाऊं कभी

तो जगा देना मुझे

पाप हो जाये अगर

तो सज़ा देना मुझे


अंधे हैं हम सब
इस अंधेर नगरी में
ठोकर खा कर गिर पडून
तो हाथ बाधा उठा देना मुझे


सोया है मन सो गई आत्मा
दुनिया की भीढ़ में खोया अस्तित्व
झाक्जोर कर

जगा देना मुझे


हे प्रभु,

उंगली पकड कर

तुम मुझे अवलम्ब दे दो

ठगिनी बहुत,

माया जगत की,

ये नचा दे ना मुझे ....

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

खेल रही मृगछौने सी कमरे कमरे धूप,

चिडिया चीं चीं कर उठी खिला धूप का रूप ॥

खिला धूप का रूप बसंती मौसम आया,

किस बाला ने किस कूंची से इसे सजाया ॥

रूप अनोखा सज उठा छुप गया रूप चितेरा
मन वीणा भी बज उठी, कण कण हुआ सवेरा ॥

छम छम करती देखो होथूं पर मुस्कान चली आई
चमक चांदनी सी अखियूं में पहचान चली आई

रुन झुन करती बागो में लो हर काली आई
झोली भर खुशीआं ले में भी तेरी गली आई

घर आँगन में रौनक यह यूं भली आई
लो आज बसंती हवा यह संदेसा लाइ

खूब खिलो हसो महको सब आज बसंत ऋतू आई

सोमवार, 15 मार्च 2010

तेरी याद !!

तेरी याद !!


नंगे पावँ

बिन आहट

चुप चाप चली आती है


सुब्ह सवेरे

मेरी नीद के द्वारे पर

दस्तक दे मुझे जगाती है


मेरी अंखियों से

चुपके से

नींद चुरा ले जाती हे


मन के वसूने कोने में

मीठी सी

गुदगुदी सी कर जाती हे


कानों में धीरे से

प्यार के बोल

फुसफुसाती है


कर आलिंगन

चूम गले को

बालों को सहलाती है


हर पल दिल को

और रूह को

नाजुक सा छू जाती है


कभी सिरहाने बैठ देखती

कभी जगा, मुझ से बतियाती है


तेरी याद



दिन भर यूं ही

मेरा साथ निभाती है

फिर थक कर

मेरे तकिए पर

सर रख रात बिताती है


नींद उनींदी,

याद रात भर

सुख सपने दिखलाती है
फिर सुबह सवेरे

चुपके से आ

सहला मुझे जगती है

जब तुम जाते हो

पल पल भारी

यादें बहुत सताती है

जाने को तो तुम जाते हो

याद यहीँ रह जाती हैं



मुझको बहुत सताती है ।



नंगे पावँ

बिन आहट

जाती हैं - आती है ।

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

साजन की धडकन का गीत

साजन की धडकन का गीत



बन के धड़कन, तेरे दिल में, धडका करूँ

रूह बन कर, तेरे तन में, बसती रहूँ ॥



बन के दृष्टि, समाऊँ, तेरे नैन में
तेरी नज़रों से, दुनिया, यूँ देखा करूँ ॥



मैं जो छू लूं, तो सिहरन, तेरी बन रहूँ

तू जो छू ले, तो निस दिन, ही महका करूँ ॥



तू जो बोले, तो निकले, मेरे बोल ही

जब भी बोलूँ, तेरी बातें, बोला करूँ ।।



पास बैठूँ, तेरे तो, सखा भाव से,

तेरी संगी बनूं और सखी हो रहूँ ॥

औढे तू जो, अगर, बन जाउँ औढनी
बिछ जाउँ, तेरे तल, बिछौना बनूँ ॥

तू चले तो, चरण में खडाऊ बनूँ

तेरी सांसें बनूं, संग हमेशा रहूँ ।।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

कभी जो फुरसत हो तुम्हे

कभी जो फुरसत हो तुम्हे

दिल के दरवाज़े पर दस्तक देती है, सहमी सी इक धडकन हर रोज़
सूनी अखियाँ बेबस सी, करती ही रहती हैं तुम्हारा इन्तजार हर रोज़


कभी जो फुरसत हो और सुन पाओ उस दस्तक को तो झांको
दिल की आंखों के झरोखों से तुम पाओगे मेरी बेकसी हर रोज़


बस देख लेना नज़र भर , इस अकेली सी धडकन को
जो सूनी राहों में करती ही रहती है इंतजार हर पल हर रोज़


इक नजर प्रेम भरी जो मिल जाए, जी जायेगी सांसे, थिरक उठेगी
जा बसेगी दिल में, धडकेगी तुम्हारे तन मन में, हर पल हर रोज़


बस ही गए हो जो आंखों में, तो न जाओ इस दिल से भी कभी
बसे रहो धडकनों में - ख्वाबों में - ख्यालों में, यूं ही पल पल हर रोज़

रविवार, 22 नवंबर 2009

कैसा यह अहसास मुझे अब !!

एहसास सा यह होने लगा है ।
करीब मेरे कोई आने लगा है ।।

दिल-ओ-जाँ से जैसे कि चाहने लगा है ।
कुछ प्यारा सा मीठा सा होने लगा है ॥

कुछ डर सा भी भी तो यूं लगने लगा है ।
कि सोया था अब तक वो प्यार जगने लगा है ।।

उमंगें, अंगडाइयां लेने लगी हैं ।
और मन भी भर भर के आने लगा है ॥


कोई क्यों इतने नज़दीक़ आने लगा है ।
क्यों दिन में सपने दिखाने लगा है ॥

क्यों मासूम दिल को धडकाने लगा है ।
क्यों एहसास मीठा वो जगाने लगा है ॥

शायद वो प्यारा सा लगने लगा है ।
या शायद मुझे प्यार होने लगा है ॥

बुधवार, 4 नवंबर 2009

जब तक

जब तक नज़रें थी अपने पर , ख़ुद को ही देखती थी मैं ,
जब से मिली तुम से नज़र, ख़ुद को देखना भूल गई ,

जब तक मिली ना थी तुमसे, खुद को ही जानती थी
जब से मिलना हुआ तुम से, खुद से मिलना भूल गई ,

जब तक रहती थी अपने घर, ख़ुद के साथ ही रहती थी ,
जब से आ गई घर तुम्हारे, खुद के घर का पता भूल गई

जब तक अपनी दुनिया में थी , लौट आती थी अपने ही पास
जब से खोई तुम्हारी दुनिया में, वहां से लौट के आना भूल गई

रविवार, 1 नवंबर 2009

राह दिखलाओ

ध्यान इक धुंद में कहीं कुछ खो गया है !
मन किसी गहरी नींद में ज्यों सो गया है !!

अरे, एक दीप इस घर में कोई तो जला दो !
मेरे सोए हुए मन को ज़रा झकझोर जगा दो !!

अमावस सा यह जीवन क्यों भला यह हो गया है !
ज्ञान मन का क्यों ह्रदय से दूर कही पर खो गया है !!

कोई तो दे के न्योता आज सूरज को जा लिवा लाओ !
खोए हुए ज्ञान को फिर मेरे घर राह दिखलाओ !!

सैलाब मैं कैसे धरोहर सब मेरी क्यों बह गई है !
और लकीरों में भी तो कुछ छिन गयी कुछ रह गयी है !!

कोई करो मेरे लिए कुछ दुआ कि सैलाब बाँधू !
और फिर संयम सहारा ऐसा बने कि मन को साधूँ !!

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

ना तेरे आने की खबर
ना जाने का सबब
दिल कांप उठा है सीने में
जब जब तेरी याद आती है

नए तेरे पाने की ख़ुशी
ना जुदाई का है गम
बस यूंही आन्हें भरा करें हम
जब जब अँधेरे चने लगते हैं

ना हो सके हम ही तेरे
ना ही तू हुआ हमारा
पर तेरा किस और का हो जाने
नहीं इस जिंदगी को गवारा

ना मंजिल है कोई
ना कोई हमराह -इ रकीबा
बस यूंही धारका करे गा
यह दीता उम्र आवारा

ना माय ना साकी ना मैखाना
लाबून तक पहुँचने से पहले ही
छलक गया मेरा पैमाना

बस इतना बता दे मुझे ना खुदा
क्या यही है नसीब मेरा
जलना और जलना बस
जाल जल के ख़ाक हो रहना

की अभी है कुछ बाकि
मेरे हिस्से की
तेरे मैखाने में मेरे खुदा

diwali

दूर से देखा जो सेहर अपना
लगा गगन जमी पर उतर आया है
मिलने को जमीं से

जिधर देखूं रात सजी है
दुल्हन सी
हर दिल टिमटिमा रहा है
रोशन हो प्यार में

ख़ुशी से हर घर महक रहा
हर आंगन जुटा है पूजा में

हर एह्लीज पर
ज्योति आमंत्रण की जगी है

मीठअ सा हो रहा है मन आज
सभी की रूह में मनो रागुले पफूट रहे हूँ

सज सवर्ण कर इंसानियत
मिल रही है गले इक दूजे के

तोफे मिअलं के
ले ले कर बैठे हें सभीi

कुछ ऐसा नजारा बन रहा है
मनो राम राज लौट आया हो आज

हर घर में ख़ुशी के दीप जले हैं
आज दीपावली आई खुशिओं भरी

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

काफी है

जिन्दा रहने के लिए काफी है

इक मुठी आसमान
ताजा हवा के झोंके
झरने का शीतल निर्मल जल
जिन्दा रहने के लिए काफी है

सर पर इक छापरी छोटी सी
इक चूल्हा इक हंडिया

इक थाली इक कटोरी इक गिलास
एक दो मुठ्ठी अनाज
पेट भरने के लिए काफी है


इक चटाई इक बिछोना
इक ओढनी इक तकिया
इक लोरी कुछ मीठे सपने
नींद लेने को काफी है

इस के अलावा जो है सब
इक भेड चाल है बस दिखावा
इक झूठा सच या डरावना ख्वाब
नही जिस के लिए कोई माफ़ी है

इंसान को इंसान होने के लिए
इक दिल दरिया , दया और ज़मीर
इक जेहन सूझवान
इक रूह प्यारी सी काफी है

इस देह के मनमन्दिर में
इक सिंहासन हो हरि का
ज्यों सोने चांदी का रत्न जडाऊ

इक मुकट इक हीरे जरी खडाऊं
जिस की करें पूजा और ध्यान
इबादत में झुका सर
समर्पित जीवन के लिए काफी है

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

मीरा या माया ! दोनो सच !

एक मुखौटा औरों जैसा ...
छिपा है जिसमे चेहरा मेरा ...
आडंबर हैं आधा जीवन
और पाखण्डी मेरा मधुवन
मेरी श्रधा प्यार सभी कुछ
एक छलावा सा यह यौवन ...

ढोंग करूं मैं पूरा पूरा
सच को उघाडूं सदा अधूरा
माहिर हूँ मैं माया रच दूं
संतों का अस्तित्व मिटादूं

पर मेरा सच मेरे अंतर में
मुझ से मिलना हो जो घर में
चले आओ मन के इस तल में
ताला है इस किवाड- द्वार पर
विरला ही चल सके राह पर

यह मीरा का आमोदित घर है
दस्तक है उस पार ब्रह्म की
अन्दर है मंदिर की घंटी
अन्दर गिरजाघर की प्रेयर
और अजान सी टेर यही पर
गुरद्वारे की बानी गूंजे
पलक भीग गयी सुनते सुनते

इस दहलीज़ पर एक अभागन
खुद बहुतेरे रह जाती हूँ
ठिठके से पग रुक जाते हैं
दस्तक देने से पहले ही
लौट लौट फिर फिर आती है ..

मैं मीरा, मैं माया आधी
जगत मुखौटे में उलझी , बांधी
पूरा सच क्या है, सुलझा दो
प्रेम गीत गा मुझे सुला दो !

बुधवार, 30 सितंबर 2009

मेरा सपना

मेरा सपना

अम्बर से हर बूँद बटोरूं
प्रेम - ओस की प्यासी मैं
रुन झुन चलूं गगन मंडल में
बादल की करूं सवारी मैं !!

कतरा कतरा पंखुडियों का
भर अंजुली में इतराऊं
चन्दन सी काया बन जाउं
श्रृद्धा - गीत निरंतर गाऊं !!

प्रेम जगत के पथिक संग ले
प्रेम पंथ पर जल बरसाऊं
मैं मीरा बन नाचूं गाऊं
मै नदिया बन बहती जाऊं !!

मै बनूं वृक्ष और छाया दे दूं
थके हुए झुलसे हृदयों को
बनूं मरहम और जख्म मिटाऊं
गोद बनूं और रोग मिटाऊं !!


भूखे को भोजन बन जाऊं
बनूं सहारा मैं निर्बल का
सिद्धार्थ हृदय बन पीडा हर लूं
फिर मीरा बन नाचूं गाऊं !!

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

हां तुम कुछ ऐसा ही करना

हां तुम कुछ ऐसा ही करना


हां कुछ ऐसा ही करना

अपने नैनों से

अपने कानों से

अपने स्पर्श से



मेरे अस्तित्व में

समाहित हो कर

मेरे भीतर बहकर . रहकर ..

अपनी दृष्टि दे कर मुझको

अपनी शक्ति देकर मुझको

बस जाओ यूं कि ...

हां कुछ ऐसा ही करना


होंठ मेरे हों गीत तुम्हारे

स्वर मेरे हों कंठ तुम्हारे

हर सिहरन, ज्यों तुम छूते हो

हर धडकन, ज्यों तुम बसते हो

बस जाओ तुम यूं मुझमे कि ...

हां कुछ ऐसा ही करना





चेतन में अवचेतन में तुम

जाग्रत में हर सपने में तुम

इस युग में हर जन्मों में तुम

मेरे भीतर बहकर . रहकर ..

अपनी दृष्टि दे दो मुझको

अपनी शक्ति दे दो मुझको


फिर से दे दो मुझे वो शुचिता

स्वच्छ हो सकूं बनूं अमृता

कौमार्य मेरा फिर मुझ मे भर दो

सुहाग बनो तुम सांसे भर दो !

बस जाओ तुम यूं मुझमे कि ...

चेतन से अवचेतन कर दो ...



बस जाओ तुम यूं मुझमे कि ...

हां तुम कुछ ऐसा ही करना

-------------------------
- Show quoted text -

शनिवार, 12 सितंबर 2009

... तो कोई बात बने

... तो कोई बात बने


पन्नो पर बिखरे पड़े हैं शब्द मेरे यहाँ वहाँ
इन्हें समेट पाऊँ तो कोई बात बने

स्याही सी पहेली है हर सूं जैसे रात का अँधेरा
सहर हो जाने दो तो कोई बात बने

जुल्फों से उलझे उलझे से हैं जज्बात मेरे
इन्हें संवार लूं तो कोई बात बने

आवारा हवा से हुए जाते हैं ख्यालात
उन्हें लगाम दू जरा तो कोई बात बने

ख्वाब सो गये हैं अब गहरी एक नींद में
उन्हें जगा पाऊँ तो कोई बात बने

एहसास सभी उसके बिखरे पड़े हैं बून्दों से
सांसों की माला में उन्हे पिरो लूं तो कोई बात बने

मेरे दिल में छिपा बैठा है बस के कोई चाँद सा
उसे चान्दनी का बना पाऊँ तो कोई बात बने

आ खुद ही मुझ को ढूंढो मुझे सम्भालो
मैं घर को लौट पाऊँ तो कोई बात बने

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

लम्हा लम्हा पल पल छिन छिन

छिन छिन करते रहे तुम से प्यार
पल पल करते रहे बस इन्तजार

लम्हा लम्हा जिंदगी यूहीं कहीं घटती रही
कतरा कतरा हम यूंहीं मरते रहे


टिक टिक करती घडी इंतेज़ार की
देती रही पल पल मेरे सीने में जखम
जार जार रोता रहा एतबार का मंज़र
मर मर के जिये कैसे कोई तज़बीज़ दे मरहम
लम्हा लम्हा जिंदगी यूहीं कहीं घटती रही
कतरा कतरा हम यूंहीं मरते रहे

थम थम वक़्त यूंही सरकता रहा
और हम, कदम दर कदम बढते रहे
जिन्दगी की रोशनी कहीं खोती रही
दम दम सिसकता सा सरकता रह गया यह दम
मर मर के जिये कैसे कोई तज़बीज़ दे मरहम

और तुम्हारी याद में घुटने सा लगा यह दम
छिन छिन मिलने वाली छिन गयी हर ख़ुशी
बूँद बूँद आंसू टपकते औ' सिसकते हम
सिसक सिसक यूं जिंदगी चलती रही


थम थम के भी तो देख लो पल भर जरा
रुक रुक के दीदार दिल का कर तो लो
जरा जरा सा क्यों करो एतबार तुम
भरा भरा है प्यार तो तुम मिल तो लो
थमी थमी सी जिंदगी पल पल गुज़र ही जायेगी
बहने लगेगी प्रीत , प्रीतम मिल तो लो

थम थम के भी तो देख लो पल भर जरा
रुक रुक के दीदार दिल का कर तो लो

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

चांद सलोना प्रीतम जैसा

भूखे की रोटी सा चांद
प्रेमी की महबूबा जैसा
राही का हमराही बनकर
साथ निभाता राह बताता

चांद सलोना प्रीतम जैसा
मेरा मन निस दिन हर जाता

सूरज के घर भिक्षु बनकर
सन्यासी सा वह ज्योत मांगता
बदली संग रास रचाता
नभ में मोहक चित्र बनाता ..

चांद सलोना प्रीतम जैसा
मेरा मन निस दिन हर जाता

दादी नानी का प्यारा चन्दा
कथा कहानी में छा जाता
बचपन में मामा सा प्यारा
अब, प्रेमी सा रूप बनाता

चांद सलोना प्रीतम जैसा
मेरा मन निस दिन हर जाता

प्रीतम प्यारे तुम भी आओ
चन्दा बन मन में बस जाओ
अठखेली कर न तरसाओ
बन के चान्दनी ही छा जाओ

रविवार, 6 सितंबर 2009

अभिनन्दन

अभिनन्दन


सुबह सुबह की महकती हवा
नए जन्मे बच्चे सी ताज़ा
ज्यों धीमे धीमे आँख खोलती
पंख फैलाए चिडिया के नन्हे बच्चे सी
नयी कोपल सी कोमल महकती गुनगुनाती हवा ...


खिली हंसी सी खिली खिली सी धूप घर के आंगन में मीठी मीठी सी धूप
मौसम की शीतलता का पैगाम लाती गुनगुनी लुभावनी धूप ......


चहकती चिडियां
आँगन में रंग बिरंगी फूलों सी बिखरी
पांव पाव फुदकती दाना चुगती चिडिया... संदेसा देती खुले मौसम का ... सुहाने दिनों का ...


नन्हे नन्हे पैरों से भागती फिरती गिलहरियां
कभी कभार बेझिझक बेहिचक से हिरन...
चुपचाप चरते बिचरते आ जाते हैं घर के पिछवाडे में...
लगने लगता है बहार है यहीं कहीं करीब ही
देते हुये एक मुस्कान सी हर दिल में
एक उम्मीद सी हर नजर में
एक होंसला सा हर रूह में

हर दृश्य एक खबर है.. खुशी की खबर
ज्यों आकाशवाणी कर दी हो किसी ने
मन के गुलशन में इन्द्रधनुष छा जाने की
महक उठी हों जीवन की सांसें बागों के फूलों सी जग के रचनाकार ने करवट बदली है ...

नए मौसम का अभिनन्दन है

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

मन्नत

प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

पेडों पर मन्नत की झंडियां
टूटते तारे से दुआएं .. मनौतियां ..
पलक के गिरे बालों से कभी
मन्दिर में घंटियां बांध कर कभी
की है जो मन्नतें
प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

तेरे द्वार नंगे पैरों से सफर तीरथ को जान ..
कभी मंगल का लंघन तो कभी शनि का दान ...
तेरी मन्नत के लिये रोज़े रमज़ान ...
शमा गिरजे मे रोज़ रोज़ तेरे ही नाम...
की है जो मन्नतें
प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

जैसी भी हो मन्नतें आधी अधूरी
तू ही प्रभू है तुझे ही करना है पूरी
मन खरीद ले तू ही मेरा ..
पूरा कर दे इस बाज़ार का दस्तूर
बिक जाऊं तेरे लिए ए मेरे प्रभु...
प्रभु मेरे मन की मन्नत सुन ले !

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

कौन हूँ में

कौन हूँ मैं ?
धरा हूँ , अस्तित्वहीन ..
या कि, भाव हूँ निराधार ..
विचार हूँ कोई अलिखित सा शायद ...
जिसे जेहन की स्लेट पर न उतारा गया हो अभी ..

माया हूँ या माया का अंश !
भूली भटकी हवा हूँ
बिन राह के मुसाफिर की मानिन्द
या फिर खंडहर हूँ किसी कालातीत ऐश्वर्य का ..

जहां दिखा खुला आसमान सा मन
बस उसी की हो रहती हूँ ...
जहां खीच दे कोई लकीर बह निकलती हूँ उसी और
रस धार बन कर नदी की मानिन्द ..

बरस जाती हूँ जहां कहीं होती है चाह रस की ...
न वजूद है कोई न अस्तित्व न हीं आकार मेरा
माया हूँ या माया का अंश !

ऐ मेरे मसीहा
दिखा दो राह बन जाओ ज्योति
मेरे मन की नैनों की
ले चलो उस पार
जिसे किनारा कहते हैं सब
जहां भर ले कोई अंजुली में मेरे प्रेम को
हो जाऊं धूल से फूल
अर्पण हो रहूँ चरणों में तेरे
तो मुक्ति पाऊँ होने से माया के
इस रूप से ...

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

कैसी है जिंदगी
इक अजूबा है
जब हम हार बैठते हैं
तो कोई कहीं से तिनका मात्र
आ बन जाता है जीवन का सहारा
हाँ नजर चाहिए
उस तिनके को
उस मोके तो प्र्ह्चान्ने के लिएय
ख्वाब सब पुरे होने लगते हैं
सब और हरियाली फेल जाती हेई
खुस्बूएं हर सु मनो बहार
जीवन में आ जाती है
जिंदगी नए सिरे इ जीने को मन होने लगता है
यह मन भी कितना बांवरा
होता है
जो कल थक अपना हो पल में पराया हो जाता है
लाख मानाने पर भी लौट कर नहीं आता
रहता है किसी से संग
साथ निभाता है
पर सिर्फ टीबी तक जब तक
मिलता रहता है
प्यार
जीवन टिका है प्यार की बुनियाद पर
जो जितनी नाजुक उतनी ही मजबूत भी होती है
जिसे दुनिया की कोई ताकत नहीं तोरे सकती और गर टूट जय तो तो कोई जोरे नहीं सकती
प्यार धेरून
पर्बतून समन्द्रून
आकाशून
धरती
सब नक्श्त्रून से भी बढ़ कर मले आप को
मेरी तरफ से
सिर्फ इक कविता के बदले

बेच दे मन

पसरे सुबह बन कर
चले हवा हो कर
बहे तो गंगा सागर हो कर

चमके तो चांदनी सा
फैले हर सू खुसबू सा

दुल्रारे गोदी सा भूम हो
भरे पेट बन्स्पत हो
आलिंगन में ले ले कुदरत हो

सर पर छत सा गगन वोह
रोशन हो धुप सा वोह

तो कहाँ

छिप छिपा सके है एह इंसान तू
उस की नजर की ज्योत है चारूं और

आ शरण पा आर्शीवाद
कर दे तेरे सरे गुनाह मुआफ
मिल के इक से इक हो रह

झुका दे सर बेच दे मन परभू के पास

बुधवार, 12 अगस्त 2009

मेरे मालिक

कची नींद में करवट बदलते ही
एहसास जग जाएं तो मालूम होता है
मेरे मालिक का हाथ है सर पर मेरे

आँख खोल देख पाती हूँ
गर झरोखून से उस पार
जहां रहता है मेरा प्रीतम प्यारा

समझ जाती हूँ
नहीं मेरे भीतर ही है
यहीं है मेरे आस पास

दिन भर की हर मुस्कान
है उसी का आशीर्वाद

झाँक झाँक मेरी आन्खून से
देखे सब संसार
फिर कहे हौले से मेरे कानो में
कर प्यार प्यार कर

हर सु मैं ही हूँ बिखरा हुआ
कण कण हूँ मैं ही बसा हुआ
मेरा ही रूप है तू भी

कर ले खुद से भी प्यार
बस प्यार ही प्यार
गली के कोने पर जहां छोर कर आई थी
आज भी वही देख पाती हूँ
आप की उदास आँखें रुकी हुई
आप मेरे मुड के देखने का इन्तजार करते रहे
पर नहीं जाना
की आज भी मेरे पीठ पर गहरे निशाँ हैं उन
गडी गडी नजरूं के
में मजबूर हूँ सामने देखने के लिएय
पर पीछे क्या है जानती हूँ खूब
उसी दुनिया किहूँ में आज भी
मुख सामने है पर दिल वही
सड़क के किनारे उसी मोड़ पर छोर आई थी
जाओ लाओ ना
दिल मेरा संभाल लो
मेरी खातिर

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

कितनी अकेली बेचारी रात ..

सांझ होते ही
सूरज के ढलते ही
रात भागती फिरती है
गली गली
कूचा कूचा नापती
कभी इस और तो कभी उस चोर
नदी किनारे
सागर की लहरों के पीछे
कभी चढ़ जाती पहाड़ पर

कभी छिप जाती पैडों तले
भागती लुक छिप जाने कहाँ कहाँ
यहाँ वहां कहाँ कहाँ
इधर से उधर तक
तो कभी उधर से इधर तक
सर पटकती रोती बिलखती
ना कोई साथी
ना कोई सहारा
कोई ना कहे आना दोबारा
कितनी अकेली बेचारी रात ..


संग चले अंधियारा
कभी तारों से कहती

कभी चंदा से मिन्नतें करती
पर यूंही दौड्ती भागती सी रात ..


धीमे से खसकती जाती
आज की रात पलभर में
कल सुबह की बाहो में
यूं ही छिपती जाती
खिसकती खिसकती आज की रात ...


पल में होगी कल की सुबह
रात आज की रह जाओ मेरे पास
आज की रात मेरे हो जाओ...

रविवार, 2 अगस्त 2009

तुम कब आओगे

नयनों के दीपक जला,
कर पलकों की ओट
छुपाए पावन झकोरों से
प्रीत प्यार की ज्योत

ठहरी है धड़कन मन की
यही कहीं देहलीज़ पर
कब आओ गे प्रीतम प्यारे
तुम मन की देहलीज़ पर

बुझ ना जाए आस मेरी
यही है डर मुझको भारी
पलक झकोरे खोले बैठी
इंतज़ार में मैं बेचारी
सो ना जाए धड़कन मेरी
कब आओगे क्या है देरी

हवा में खोजूं महक तुम्हारी
फिजां में बसी हो सांस तुम्हारी
आस तुम्हारी साँसें मेरी
हर आहट पर आसें मेरी
हर साया, कि ज्यों तुम तुम आए
कब आओगे क्या है देरी
कब आओगे क्या है देरी

शनिवार, 18 जुलाई 2009

आपके नाम

थामा जो आपने हाथ
लगा बचपन से है साथ

एक बहती धारा हूँ
जिसे थामा इक मौज ने
आओ दोनों मिलके बह चलें
उस सागर की ओर
जिसका न कोई ओर ना छोर

थामा जो हाथ फिर
साथ न छोडेंगे
चलते चलते साथ फिर
साथ ना छोडेंगे

ये वादा है तुमसे
ज्यूं ज्योति संग ज्योत जले
मिले सागर से
हो सागर जैसे

मैं मैं ना रहूँ
तू तू ना रहे
मुझसे मैं
तुझसे तू खो जाये
तुझमे मैं खो जाऊं

आ मिल आलिंगन में
कुछ ऐसे दोनों खो जायें
कुछ ऐसे

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

पंख लगालूँ ख्वाबों के
उड़ती जाऊं दूर गगन में
इस डाली से उस डाली
ठुमुक ठुमुक कर पाँव पाँव भी
कभी पेड़ तो कभी छाँव भी

मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

भेद नहीं घर में आँगन में
उजडे खँडहर बसे महल में
भेद नहीं जंगल खेतों में
घर के आगे , पिछवाडों में
मुन्ना गुडिया खेल खेलते
मैं भी अपना मीत ढूँढती

मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

चहकूं बीच घने जंगल में
कुहकूं बीच हरे खेतों में
आये बुढापा या यौवन हो
मदमाता पन हो रातों में

मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

चोंच प्रेम की तिनका चुनती
पल पल यादों के आँगन में
इक इक धड़कन बीन बीन कर
सदा निरंतर सपने बुनती
मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

तिनका तिनका जोड़ जोड़ कर
बड़े जतन से ठियाँ सजाती
मौसम चाहे जो हो लेकिन
प्रेम मगन हो बस इठलाती

मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

आशाओं का घने पेड पर
मन का एक घरोंदा है
मन के मीत की उम्मीद लिए ही
तिनका तिनका जोड़ा है

मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

मीत मिल गया
प्रीत सज गई
गीत बज गया
रीत चल गयी

प्रेम मगन हूँ शब्द चुक गए
प्रेम पुजारन कहीं खो गयी
बचे कहाँ तुम बची कहाँ मैं ?
दोनों मिल कर एक हो गए
मैं चिडिया एक प्रेम पुजारन !!

सोमवार, 13 जुलाई 2009

गुनहगार

सूने नयनों के कौरों से,
देखे हैं टपकते सपने मैंने
चाहा तो था कि दौड़ कर चूम लूं
पलकों पे सजा लूं अपनी
थाम लूं लबों से,
अपना बना लूं , तेरे सपनों को

इस से पहले कि ये सपने
नसीब के हाथ से छूटे , टूटे और बिखर जाए ..
इन्हें नींदे मिलें , मंजिल मिले..
कि इसी कोशिश में समेट लूँ सारे गम भी तेरे ...
यह दिल है कि उधेड़ता बुनता रहता है तमन्नाएँ , हसरतें
कि तेरे साथ हो शुरू फिर एक कहानी प्रीत की
और फिर से , मचलने लगे दिल
हो फिर से धड़कनों में हरारत
दिल फिर से करे बातें तेरी रात रात भर ...
मैंने अपनी मुस्कानों में से
कुछ मुस्काने संजोई हैं जीने के लिए तेरे खातिर...
कुछ साँसे भी माँगी हैं सीने के लिए तेरे खातिर ...

अफ़सोस !
किस्मत बड़ी है और बहुत छोटे हैं मेरे हाथ
अंजुली भर ना पाई खुशियाँ का साथ
खोखली खुशियाँ सूनी मुस्काने
अधूरी कहानी फीकी प्रीत
अँधेरी रातें खाली हाथ....
मैं संभाल न पाई तेरे सपने की सौगात ....
आज भी हैं सपने मुझ पर उधार है तेरे
मुझे माफ़ करना मेरे मन मीत
कि गुनहगार हूँ मैं तेरी

बुधवार, 8 जुलाई 2009

seep ka moti

बचपन की इक भली सी याद
आज भी है मेरे पास
छुपा के रखी है नज़रों से दुनिया की
की लग ना जाई नजर दुनिया की
बचपन की मीठी सी याद
जब सपने मेरे
तुम देखा करते थे मेरी आन्खून में
हाथ थाम कर ले जाते
दूर बहुत दूर मुझे मेरे ही ख्वाबो की दुनिया में

जवान हों सपने इस से पहले
पहचाने चेहरा तुम्हारा उस से पहले
छोर मेरे सपनो का साथ
रहने चल दिए तुम किसी और के सपनो के साथ

बरसों झाँका हर नजर में
ढूँढती रही सपनो को अपने
खोजा तुम को हर रोज़ नींदों में
गली गली रातों की छानी

हर अनजाने को समझा तुम हो
हर कागज़ के टुकरे को समझा ख़त तुम्हारा
हर पते को समझा पता तुहारा
ना नाम ना निशाँ ना कोई ख़त ही मिला तुम्हारा

अधूरी थी कोशिशें मेरी
तभी ना हो पाईं पूरी
भूल गई मैं हार गई मैं
थाम लिया सच का दामन
मान लिया तुम ना आओगे

बंदकर सपनों को काले बक्से में
कर दिया जुदा हो गई बिदा
चली दी ससुराल हुई बेहाल

भूली बचपन के सपने
मिलगे सब मेरे अपने
यूंही जीती रही ले खाली खाली रातें
बिन सपनो के मिली बच्चों की सौगातें

फिर इक दिन यूंही सदियों बाद
लो आई फिर तेरी याद
कानो ने सुनली दिल की पुकार
देखी सूरत जानी पहचानी
सुनी कहानी सुनी सुनाई

घबराई सी बहकी बहकी बात
आ कर थामे मेरे हाथ
जागने लगे मेरे बचपन के खाब
सपने सभी लौट आये आज

बहार निकली फिर अपने सीप से
बनने को मोती
मचला मन बहुत कोशिश की
काश में उन की होती

पलक झपकते टुटा सपना
वोह ना था कोई अपना
आज फिर मेने देखा वोह सपना
जो कभी ना हो पाया अपना

रह गई अपना सा मुह ले कर
बंद हो गई में फिर सीप में
बस गई सीप को अपना घर कर
सो गई में फिर रो रो कर

काश में ना होती सीप का मोती
काश में तुम्हारी होती
फिर ना कभी में यूं रोती
रात भर में उस सपने के संग सोती

सोमवार, 6 जुलाई 2009

पंख पसारे भोली चिडिया !

पंख पसारे भोली चिडिया !

सोचा तो ये था !
कि सफ़र करते करते उम्रभर ..
जन्मो के सफ़र तय करेंगे ..

मिला जो भी उसे भी साथ ले लिया
कि सफ़र हसीं हो गया
जो छोड़ गए साथ
पर उन को पीछे नहीं छोड़ सके...


ऐसे ही इक दिन
सफ़र के किसी पडाव पर
इक जाना पहचाना सेहर
बचपन का जवानी का सेहर
जो गुजरा नज़र से
जुटा के हिम्मतें बचपन के प्यार की
आँखों में सजा कर सपने पुराने
सब दूरियों से दूर ..


सदियों के फासले पल में तय कर गए
आ गए मेरे मन के घर -आँगन में
जहां आज भी किसी कोने में पड़े थे
सपने बचपन से
कुछ सहमे से इन्तजार में किसी के
उन पर ढल चुकी थी किसी और के हक़ की छाया
जिसे पलकों से अपनी, आपने उघाडा
फिर धो के प्यार के आंसुओं से
और सपने नए से सजाए आप ने
थामा हाथ और ले चले मेले में
बह निकली झरने सी प्यार की निर्झरनी
बैठा के दिल की छाया में
सिखा दिया जीना और प्यार करना


अब उड़ने चेह्काने लगी जो चिडिया
पंख क़तर दिए सैयाद ने
डाला सोने के पिन्जरेमें
और उड़ा ले गया सात समंदर पार
बहुत दूर
इक पत्थरों की दुनिया में
जहां ना मित्र ना प्यार
न प्रीत का संसार


तभी
एक दिन आया कोई मुसाफिर
अनजाने में खोल दिया पिंजरा दिल का
और पंख पसारे फुर हुई चिडिया
जा बैठी सात समंदर पार
फिर उसी दिल के घरोंदे की मुंडेर पर ....

ek dua

क्षितिज के उस पार
कहाँ क्षमता है इन ज्योति हीन नयनों में
जो पा सकें दरस तेरा

है जो तू हर सू बसा
कहाँ हैं वोह सपर्श इन जड़ अंगों में
की छूं कर महसूस कर सकें अपने प्रभु को

ऐसी श्रवन शक्ति नहीं की तेरे उपदेश सुन
समझ उन पर करूं अमल तो हो पाऊँ तेरे करीब मेरे मालिक

दिल के आँगन में है भीड़ भाड़ इतनी
की हर समय मजमा लगा है
झूठ ईर्षा द्वेष क्रोध का
तो कहाँ बिठाऊँ तुझे मेरे प्रियतम

बर्तन भी मेरी रूह का है कसैला
जीवन भर की कड़वाहट ढोंग और नफरतों से
कैसे पड़े तेरी पाक कृपा की नज़र मुझ नाचीज़ पर मेरे हरी

लो हाथ उठा करती हूँ दुआ
झोली फैला मिन्नतें में करूं तुझ से
आँखों में हैं आंसू शारदा के बैराग के
करो कृपा प्रभू मेरे

दे दो वो नजर जो दीदार करूं तेरा
वोह श्रवन जो सुन के तुझे अपनाए
हो जाए यह दिल वीराना जगत से
माँज डालो मेरे रूह के बर्तन को
की अंजुली भर लूं तेरी कृपा से

करदो अनाथ की पा सकूं नाथों के नाथ को
फिर मिल हरि से मिल अलोप अलोक हो हरी ही हो रहूँ

बस यही है दुआ मेरे हरि

bhram

रिशवतें देतें हैं हम रोज़ सुभ सवेरे
चडते सूर्य को कर प्रणाम
आते ही रात पूर्णिमा की
पहुँच जाते हैं सिफारिशें ले कर
मंगल हो या शनि
या की फिर हो गुरुवार
ढूँढ़ते हैं बहाने
तेरे व्रत रख रख तुझे रिझाने को
धुप बती दिया जलाएं
आरती उतारें घंटियाँ बजाएं तुझे जगाने को
सब करें तब तक जब तक है
सुख ख़ुशी हंसी ठहाके
बरसातें बहारें हरियालियाँ जीवन में
होती रहे मुरादें पूरी
भरी रहे झोलियाँ सब की
तो माने भी तू है
हर सू है मान लें ऐलान कर दें
पर गर किन्तु लेकिन
घटाओं के छाते ही
घाव कोई लगते ही
अमावास के आते ही
फूलों के मुरझाते ही
तपिश लगने से पहले ही
प्यारे की जुदाई का सुनते ही
लक्ष्मी के रूठते ही
सोच लेते हैं
मान लेते हैं
झट पट इल्जाम देते हैं
फैसला सुनते हैं
तू है ही नहीं
होता तो यूं न होता

रोज़ पूजा का यह सिला मिला
भ्रम है भ्रम सिर्फ भ्रम

वोह नहीं है
होता तो दिखाई देता
ऐसा कयूं करता
है ही नहीं
नहीं ............................

झूठ बोली में
इंसान हूँ ना
है इंसान गल्तियों का पुतला
अपने लिए तो बहाना है ना
लिखने में गलती हुई
भ्रम नहीं ब्रह्म है
हाँ है
वोही है
वो है तो हम हैं
सब हैं
आदमी
आ + दमी
दम आए तो आदमी
दम है ब्रह्म से
तुझसे
तू है तो हम हैं आदमी
तू है तो में बोलूँ
कहूं सुन पाऊँ कुछ लिख पाऊँ
देख पाऊँ सृष्टी तेरी
तू ही है कायनात सारी
सोचूँ महसूस करूं
हर कण में तुझे ही पाऊँ
हम सब में बसता तू ही
फिर भी हम भरमे हैं
भ्रम में हें हम सभी
सब झूठ है
बस एक तू है सच
तू ब्रह्म
है
भ्रम नहीं

intjaar

खामोशियाँ छाई रही यूंही बरसों
मदहोश से पड़े रहे जज़्बात मैखाने के किसी कोने में
ढूँढती रहीं मेरी चुप्पियाँ किसी को
दिल मेरा भटका गली गली
भीढ़ में हर चेहरा लगा तेरा ही चेहरा
आवारा सी हो घूमती रही सोच मेरी
मेले में मैं रही अकेली
एक उंगली जो थामी थी बचपन ने कभी
आज बूढी हुई उंगलियाँ
खोजती फिर रही हैं उन्ही स्पर्शों को
शून्य सा हो वक़्त भी चलता रहा थम थम कर
थम गई जिंदगी सदियों पहले से
भागते फिरे जुगनुओं की पीछे रात भर
आवारा ख़्वाबों को बाँध बाढ़ रखते रहे
जिंदगी टंगी रहगी रही दरख्तों पर कटी पतंग सी
आज भी है
इन्तजार इन बुझी बुझी आँखों में

hi raam

घुप अँधेरा
काली स्याह रात अमावास की
चमकती बिजलियाँ
गरजते बादल
बड़ी भयानक रात है
यह जिंदगी

अद्भुत अनोखी
चाँद बादलों में मुँह छिपाए है डर से
तारे भी सब खो गए

घनघोर जंगल है सब ओर
वीराने सन्नाटे खामोशी है सब ओर
फिर भी
अकेले नहीं हैं हम
भीड़ हैं यहाँ
मेला लगा है
मजमें हैं सब और
कहीं नाग सरसराते हैं
तो कहीं उल्लू पुकार कर रहे
कभी सुनती हैं चमगादडों के फड फडाने
की आवाजें
कहीं कहीं से कोई पक्षी भी गलती से चहचहा उठते हैं
यूं तो जुगनू हैं कहीं कहीं
दिल बहलाने को
घबरा के हम एकेले से
ढूँढ़ते फिरते हैं कोई सहारा
पास है इक लाठी सुरक्षा के लिये
बस एक मात्र सहारा
उस का
यूं ही गुजरती रात सी इस जिंदगी में
जब कोई ठोकर लग जाए अचानक
मुख से निकले हे राम
तो इक बिजली सी कौंध जाए हर सू
गूँज जाए इक नाम
हे राम
भागे चले आयें सब चाँद तारे
बादल छत गे डर कर
नई उम्मीदों की किरने आ गिरी झोली में
इक ज्योति छू गई इन बंद आँखों के दीयों में
फैल गया परकाश हर सू
वोह गयी लाठी
खो गए अँधेरे जीवन के
जो थामा हाथ खुद
राम ने
मेरे और कर लिया इस भव सागर से पार
हे राम

ishq

लैला मजनू का ज़माना भी क्या खूब था
हीर रांझा की दुनिया भी निराली थी
इन के इश्क ने कर दिया था जमाना दुश्मन
मुलाकातें थी कितनी अधूरी
मिल ना पाए वोह जिंदगी पूरी
पर आज भी दुनिया किस्से सुनती सुनाती है
की मोहब्बतें थी तो उनकी ही थी पूरी
बचपन का हुआ प्यार
मरते दम तक निभाया
वादा इश्क का मर के भी निभाया
और आज का इश्क
आज भी है बच्चे बच्चे को है
हो जाता है पहली नजर में ही
सेटे लाईट का ज़माना जो है
सब होता है बड़ी रफ़्तार से
ना नज़रों का मिलने
ना वो हिरन ना कबूतर
ना कोई चिठ्ठी ना पत्र
ना डाकिया ना दूत कोई
पल भर में ही
इन्टरनेट पर ही
बिन देखे बिन सुने बिन मिले
एक्सप्रेस मेल की रफ़्तार से होता है इश्क भी
पल में जीने मरने के वादे
पल भर में जन्मों के बंधन
कभी ना बिछड़ने की कसमें
पर जितनी जल्दी यह इश्क की गुड्डी चढ़ती है आकाश में
उतनी ही जल्दी कट के
फड फडाती लडखडाती
कभी इस पेड़ पर तो कभी उस छत पर टंगी मिलती हैं
जो कल हुआ इश्क वोह आज हवा हो गया
और शायद आज नया किसी और से होने को है तैयार
यह इश्क नहीं नज़रों का धोका है
दिल बहलाने को लेकिन ख्याल अच्छा है

soch

कुछ सोच में पड़ गए हैं ख्वाब मेरे
कैसे दे पाऊँगी साथ
कयूं कर चल पाएंगे उन राहों पर
की जज्बात तुम्हारे
ख्वाब भावनाएं सब के सब
हैं सागर से गहर गंभीर
जब से जज्बातों ने मेरी
थामी है उंगली तेरे गंभीर जहन की
कदम कदम चलने की कोशिश कर रहे हैं
गिरते पड़ते
लडखडाते नयी राहों पर
चल पड़े हैं खोजने माजिलें नई
गर बना रहे यूं ही साथ हमारा
थामे रहो तुम हाथ हमारा
तो शायद हो रहेगी सर मंजिलें अपनी
आज जो दिल की जमीन
नहीं पहचानती इन हलके ख्यालों के कदमो को
आज जो सुनाई नहीं देती आवाज इन खोखले ख़्वाबों की
कल जब यूंही साथ साथ चलते हो रहूँगी में तुमसी
ये ही पाँव भारी हो जाएं गे
अपने कुछ नक्श छोड़ जाएंगे
कल आने वाली पीढी फिर इन्ही नक्शे क़दमों पे चल
कर लेंगे मंजिलें सर
जो हम ने किये सफ़र तय
वोह मंजिलें हमारी औलादें पा जाएंगी
जो सफ़र रहगे हमारे अधूरे
वोह करेंगे हमारे बच्चे पूरे
तो शायद होंगे हमारे अधूरे ख्वाब पूरे

churiyaan

चूडियाँ
रंग बिरंगीइंदर धन्नुष सी चूड़ियाँ
लाल हरी नीली पिलीसब रंगून की चूद्रियाँ
माँ बहन पत्नी बेटी भी पहने चूड़ियाँ
मौसो चची भुआ दादी नानीमामी ने भी पहनी चुरियाँ
लाल हरी नीली पिली चुरियाँ


कांच की लाख की स्टील की रबड़ की
सोनेकी चांदी की चूड़ियाँ
घुंगरू वाली वाली नाग्गून जडी नगीने जडी
हर औरत का सिंगार करें हरी भरी चूड़ियाँ


हर अवसर पर पहनी जाएं चूड़ियाँ
लक्ष्मी जो जन्मी पहनाएं काली चूड़ियाँ

नजर न लगे कहीं मेरी दुलारी की चूड़ियाँ
पहने नन्हे हाथ कभी चांदी की सोने की
घुंगरू वाली चूड़ियाँ

रोंनं झुन करती कभी खनकती ी
घर की रौनक चूड़ियाँ

पीले हो जाएं हाथ जो तो पहने
लाल चूडा लाल हरी चूड़ियाँ
सुहागन पहने लाल हरी नीली पिली नीली चूड़ियाँ
माथे टीका नाक में नथनी पायल कुमकुम तगरी झुमके
अन्गोठी कजरा गजरा सब हैं निभाते साथ हैं ऐसी हैं यह चूड़ियाँ
यह सुहागन की चूड़ियाँ

ये सहेली सभीकी लाल हरी नीली पिली
सोने चांदी की कांच की चूड़ियाँ

मैं भी पहनू तुम भी पहन हम सब पहने
यह प्यारी चूड़ियाँ
जीवन भर यह साथ निभाएं पर जब कोई अपना छोरे जाए साथ
टूट टूट जाएं चूड़ियाँ

सगे सम्बन्धी सखी सहेली
मिल कर सभी तोड़ डाले चूड़ियाँ
फिर न सजें ना भाएं
उसी कलाई में वही
लाल हरी नीली पिली चूड़ियाँ

सुख के दुःख की कथा सुनें यह रंगीली चूड़ियाँ
बचपन में खिलौने टूटी फूटी चूडिआं
सुहागन के दिल के तुक्रे यह रंगीली चूडिआं
विधवा की दुःख भरी कहानी यह निगोरी चूड़ियाँ
हाय
कितनी प्यारी हुआ करती यह चूड़ियाँ
अब न भाएं यह सारी चूड़ियाँ

हर औरत का गहनाहर कुंवारी का सपना
हर बच्ची का शौंक हर अल्हड का सजना सजाना चूडिआं

कितनी प्यारी बहुत सारी मन को भाएं कलाई मेंसज जाएं
लाल हरी नीली पिली यह सारी चूडिआं

रविवार, 5 जुलाई 2009

aati to gi yaad meri

जानती हूँ मेरे चले जाने के बाद
मुझ से बिछ्र के जाने के बाद
तुम्हें भीमेरी तरह मेरी याद तो बहुत आती होगी
जब जब बस अड्डे से गुजरते होगे
मेरी याद तो जरूर आती होगी
जब भी घर की देहलीज से कोई लौट लौट जाता होगा
उस में भी मेरी ही परछाई दिखाई देती होगी
कभी जब लम्बी ड्राइव पर अकेले जाते होगे
फ्रंट सीट का खाली पन अखरता होगा
और तब तो मेरी याद अवश्य ही आती होगी
जब जब एकेले बैठ चाएय के कप पे कप पीते होगे
तो कोई साथ दे उस के लिएय ही सही
मेरी याद तो फिर भी आती ही होगी
जब भी कोई करता होगा शिकवा शिकायत
मेरी याद दिलाता तोहोगा
लडू चाहे किसी से लड़ाई मेरी भी याद आती तो होगी
जब जब किताब पड़ने को बैठे होगे
उन में पड़े सूखे पत्ते याद मेरी दिलाते ही होंगे
उस काले बक्से से जब जब पुराने ख़त निकल पड़ते होगे
मेरी याद मुमकिन है सताती तो होगी
हर रोज़ जब निकालते हो चदर की सिलवटें
तो याद मेरी है जो तुम से लिपट लिपट जाती होगी
जब जब फ़ोन की घंटी बजती होगी
तुम्हें लगता तो होगा की मेरी ही कॉल होगी
रोज़ कोम्प्पुटर ऑन करते ही मेरे सन्देश ना पा कर
मेरी बहुत याद आती होगी
हर छूती के दिन इन्तजार करते होगी जब मेरे
में नहीं आती तो मेरी याद तुम्हें बहुत सताती तो होगी ना
इक बार जो बुला लोगे प्यार से में लौट आऊंगी
में गया वक़्त नहीं की फिर आ ना सकूं
बस एक बार आवाज दे कर तो देखो
लो में तो आ भी गई

achetan mein

क्षितिज के उस पार
कहाँ क्षमता है इन ज्योति हीन नैय्नूं में
जो पा सकें दरस तेरा

है जो तो हर सु बसा
कहाँ हैं वोह सपर्श इन जड़ अंगून में
की छूं कर महसूस कर सकें अपने प्रभु को

ऐसी श्रवन शक्ति नहीं की तेरे उपदेश सुन
समझ उन पर करून अमल तो हो पाऊँ तेरे करीब मेरे मालिक

दिल के आँगन में है भीड़ भाड़ इतनी
की हर समय मजमा लगा है
झूठ ईर्षा द्वेष क्रोध का
तो कहाँ बिठाऊँ तुझे मेरे प्रियतम

बर्तन भी मेरी रूह का है कसैला
जीवान भर की कड़वाहट दोंग और नाफ्रातून से
कैसे पड़े तेरी पाक किरपा की नज़र मुझ ना चीज़ पर मेरे हरी

लो हाथ उठा करती हूँ दुआ
झोली फैला मिन्तें में करून तुझ से
आन्खून में हैं आंसू शारदा के बैराग के
करो कृपा परभू मेरे

देदो वोह नजर जो दीदार करून तेरा
वोह श्रवन जो सुन के तुझे उपनाएं
हो जाए यह दिल वीराना जगत से
मांझ डालो मेरे रूह के बर्तन को
की अंजुली भर लूं तेरी कृपा से

करदो अनाथ की पा सकूं नाथों के नाथ को
फिर मिल हरी से हरी से मिल अलोप अलोक हो हरी ही हो रहूँ

बस यही है दुआ मेरे हरी

tum ho to

रिशवतें देतेंहें हम रोज़ सुभ सवेरे
चडते सूर्य को कर प्रणाम
आते ही रात पूर्णिमा की
पहुँच जाते हैं सिफारिशें ले कर
मंगल हो या शनि
या की फिर हो गुरुवार
दूंध्तें हैं बहाने
तेरे व्रत रख रख तुझे रिजाने को
धुप बती दिया जलाएं
आरती उतारें घंटियाँ बजाएं तुझे जगाने को
सब करें तब तक जब तक है
सुख ख़ुशी हंसी ठहाके
बरसातें बहारें हर्यालियाँ जीवन में
होती रहे मुरादें पूरी
भरी रहे झोलियाँ सब की
तो माने भी तू है
हर सु है मान लें ऐलान कर दें
पर गर किनतू लेकिन
घटाओं के छाते ही
घाव कोई लगते ही
अमावास के आते ही
फूलूँ के मुरझाते ही
तपिश लगने से पहले ही
प्यारे की जुदाई का सुनते ही
लक्ष्मी के रूठे ही
सोच लेते हैं
मान लेते हैं
झट पट इल्जाम्देते हैं
फैसला सुनते हैं
तू है ही नहीं
होता तो यूं न होता

रोज़ पूजा का यह सिला मिला
भ्रम है भ्रम सिर्फ भ्रम

वोह नहीं है
होता तो दिखाई देता
ऐसा कयूं करता
है ही नहीं
नहीं ............................

झूठ बोली में
इंसान हूँ ना
है इंसान गलतियूं का पुतला
अपने लिएय तो बहाना है ना
लिखने में गलती हुई
भ्रम नहीं ब्रह्म है
हाँ है
वोही है
वो है तो हम हैं
सब हैं
आदमी
आ + डमी
दम आए तो आदमी
दम है ब्रह्म से
तुझ से
तू है तो हम हैं आदमी
तू है तो में बोलूँ
कहूं सुन पाऊँ कुछ लिख पाऊँ
देख पाऊँ श्रृष्टि तेरी
तू ही है कायनात साड़ी
सोचूँ महसूस करून
हर कर्ण मेंतुझे ही पाऊँ
हम सब में बसता तू ही
फिर भी हम भरमे हैं
भ्रम में हेंहुम सभी
सब झूठ है
बस एक तू है सच
तू ब्रह्म
है
भ्रम नहीं

rail ki dopatriyaan

rail ki do patriyaan

aamne saamne rehte bhi
milti naheen kabhi
door bahut door
aabhaas hota hai unke milne ka
par kahaan mil pati hein taa umar


par humyoon to juda naheen hein
hum mile thei bichharne ko
he shaayad aur shukar hai na malki ka
kiaaj bhi hein to aamne saane
bhale hi milte naheen
milte hein kabhi kabhi

bhale hi milte hein
jub koi tisri patri
aa kar humein jore deti hai
hum jure hein

humari soch
humara ateet
humari udaan
humare nek irade
humare wishwaas
bharose humare
humare sukh
humari khushiyaan
woh bachpan ki sharartein
woh ma ki maar
woh jhule se girna
woh choti choti sanjhein
woh lardna jhagarna
woh pyaar
woh sehme sehmein hum
wih raaz woh beeteen batein
woh mil ke rona woh bicharna
woh hasna
aur phir se woh pyar
yeh sub jore hai hum ko tum ko
phir bahle hi na milein
woh rail ki do partiyaan



hum hein to saath
aamnei saamne
maano thame hoon haath
umar bhar ke liey
ek patri kabhi
doosri ko peeche
ekele naheen chorti
rakhti hai saath

woh rail ki do patriyaan

शनिवार, 4 जुलाई 2009

parchai

खामोशियाँ छाई रही यूंही बरसून
मदहोश से परे रहे जज्बात मैखाने के किसी कोने में
ढूँढती रहीं मेरी चुपियाँ किसी को
दिल मेरा भटका गली गली
भीरुं में हर चेहरा लगा तेरा ही चेहरा
आवारा सी हो घोमती रही सोच मेरी
मेले में में रहइ अकेली
एक अनगुली जो थामी थी बचपन ने कभी
आज बूदी हुई उंगलियाँ
खोजती फिर रही हैं उन्ही स्पर्शून को
शून्य सा हो वक़्त भी चलता रहा थम थम कर
थम गई जिंदगी सदियूं पहलेसे
भागते फिरे जुगनुओं की पीछे रात भर
आवारा ख्वाबउन को बाँध बाढ़ रखते रहे
जिंदगी तंगी रहगी रही दर्खून पर कटी पतंग सी
आज भी है
इन्तजार इन बुझी बुझी आन्खून में

बुधवार, 24 जून 2009

- Show quoted text -

kabhi kabhi

कभी कभी मन करता है ...

कैसा रिश्ता है यह मेरे तेरे बीच कि
समझ पाऊँ मैं न इसे न तुझे ...

कभी कभी मन करता है ...

कि आइना बनू मैं तेरा
और नहला दूं तुझे प्यार भरे आंसुओं के गुन गुने जल से
बना के पलकों का तौलिया पौंछ दूं बदन तेरा
पहनाऊँ स्पर्शों के वस्त्र अपनी नरम अँगुलियों से
कभी कभी मन करता है ...

प्रीत के आभूषणों से सजाऊँ तुझे
तू सज जाए क्षमा दया सहिष्णुता से
सुशोभित करूँ श्रद्धा का ताज,
मान सम्मान से माथे पर तेरे
बैठा कर दिल के सिंहासन पर
देदूं सारा राज पाट मेरे जीवन का तुझे
कभी कभी मन करता है ...

संभाले बाग़ डोर मेरे सांसों की तू
देदूं कुंजियाँ अपनी भावनाओं की तिजोरी की तूझे...
बन माँ बहिन बेटी सखी या प्रियतमा तेरी
जी भर प्यार परोसूं हर पल थाली मैं तेरी

कभी कभी मन करता है ...

या कि कभी जीवन संगिनी बनू मैं तेरी
या भांत भांत के रिश्तों से रिझाऊँ बहलाऊँ तुझे....

पिता भाई सखा बेटा प्रियतमसाथी
कुछ भी बने तू मेरा
जो मेरा अपना हो
हिस्सा हो मेरी साँसों का

कभी कभी मन करता है ...

मैं आइना बनू तेरा तू मेरी परछाई हो ...
यह कैसा रिश्ता है बीच मेरे तेरे
न मैं समझ पाऊँ इसे न तुझे

रविवार, 21 जून 2009

uneendein

लगाम दोगे ज़रा ख्यालों को
तो सो पाओगे ...

कह दो जरा इस दिल से कि थाम ले
खुद को पल भर के लिए
कि कुछ सुस्ता भी सको

कह दो इन आँखों को
झपक ले पलकें
कि बहुत लम्बे हैं इन्तजार
पल भर को आराम तो कर ले

लगाम दोगे ज़रा ख्यालों को
तो सो पाओगे ...

बुला लो क्षण भर के लिये ख्यालों के राही को
बैठा लो पास तो तनिक
थकान उतार लें अपनी

लगाम दोगे ज़रा ख्यालों को
तो सो पाओगे ...
- Show quoted text -

सोमवार, 15 जून 2009

जिन्दगी की परछाइयां

टूटे रोशनदान में
चिडियों के घोंसले
जिन में उन के बच्चे चहचहाते हैं...
उखड़ी खिड़कियाँ
जिन पर लकडी के टुकड़े ठुके हैं


किवाड़ भी आधा अधूरा सा
न कभी बंद हो न पूरा खुले
चाहे जो आए कुछ भी ले जाए
दीवालें कहीं हैं, कहीं नहीं हैं
उन की ओट में बच्चे लुकाछिपी खेला करते हैं

फर्श पर पैबंद लगे हैं
जीवन की दास्तानों के ...


प्रभु की कृपा की छत है सर पर
टपकती है तो घर भर जाता है
खुशियों से.. मुस्कानों से...


आँगन के गढ्ढे जब भर जाएं पानी से
तो हम भी उतार देते हैं कश्ती ख्यालों की ...


पानी जो आया भीतर कभी
न फिर लौट पाया कभी
रह गया यहीं सदा के लिए ...


बना लिया इस मिटटी के घरोंदे को घर अपना
कर लिया गुजारा ...

सूखे ख्यालों की रोटी और प्यार के रस से
भर लिया पेट अपना

हवा की सननन सनन
बरसात की रिम झिम करती लोरी ने
चांदनी के बिस्तर ने
जी भर के नींदें दी ...

इसे कोई उजड़ा मजार न समझे
यह बस्ती है मेरे बसते दिल के शहर की
जिस में बसते हैं सब दुनिया
के प्यार करने वाले दिल

टूटे रोशनदान में
चिडियों के घोंसले की तरह
जिन्दगी की परछाइयां ...

A M R I T A

aap ka teh dil se shukriya
naheen to kaun padta hai kisi ka likha aur kaun deta hai itni tawajo jarra nawazi ke liey phir shukariya

रविवार, 14 जून 2009

khyaal

मुझे ने बाँध पाएंगे ये किनारे
न ही रोक सकती ये दीवारें

मुझे न बाँध पाएँगी ये बहारें
मुझे न पकड़ पाएंगी ये हवाएं

रात ही स्याही से मैं डरती नहीं
क्या कह लेंगी मुझे यह सावन की घटाएं

यह चंदा यह तारे यह सूरज
कोई न मुझे संभाल पाए !!

यह बादल यह आकाश
नहीं मुझ को यह छू पाए !!

पास किसी के में रहती नहीं
किसी की होके रहूँ ये मुमकिन नहीं

यूं तो में सब की हूँ
जो बुलाले प्यार से
उसी ही की हो के रहती हूँ


नन्हे हाथ भी रोक लेते मुझे
प्यार की खातिर
मिट मिट जाती हूँ में

में हूँ प्रीत जो बसती हूँ सब में
पर कोई मुझे न रोक पाए
मुझे न पकड़ पाएं ये हवाएं

में लोरी हूँ प्रीत की
स्वच्छंद विचार हूँ
एक ख्याल हूँ
प्यार हूँ

शनिवार, 13 जून 2009

ik yaad

इक याद मेरी है, पास तेरे..
रख लेना संभाल कर
टूट न जाए सपना बन कर
रख लेना दिल के किसी कोने में
भूल न जाना यहाँ वहाँ रख कर
इक याद मेरी है, पास तेरे...
रख लेना पलकें बन कर
कहीं टूट न जाएं सपना बन कर
इक मेरी है पास तेरे रख लेना रूह में ढक कर

चुरा न ले जाए कोई अपना बन कर
इक याद मेरी है पास तेरे
रख लेना अपनी चाह भर कर
कहीं छीन न ले जमाना दुश्मन बन कर
थामे रहना हाथों में कस कर
कहीं मजबूरियाँ उड़ा न ले जाएं तूफ़ान बन कर
इक याद मेरी है, पास तेरे ...
ओढे रहना उसे हर पल
कोई उठा न ले जाए छल कर
इक याद मेरी है, पास तेरे ...
मिलना उस से रोज़ हर पल
अधूरी न रह जाए कहीं अरमान बन कर
मुझे ने बाँध पाएं गे यह किनारे
मुझे न बांद्ध पाएं गी यह बहारें

नहीं रोके सकती यह दीवारें
मुझे न पकड़ पाएं गी यह हवाएं

रात ही स्याही से मैं डरती नहीं
क्या कह लेंगी मुझे यह सावन की घटाएं

यह चंदा यह तारे यह सूरज
कोई न मुझे संभाल पएय

यह बादल यह आकाश
नहीं न मुझ को यह छू पएय



पास किसी के में रहती नहीं
किसी की हो के रहूँ य्व्ह मुमकिन नहीं

यूं तो में सब की हूँ
जो बुलाले प्यार से
उसी ही की हो के रहती हूँ
नन्हे हाथ भी रोके लेते मुझे
प्यार की खातिर
मिट मिट जाती हूँ में
में हूँ प्रीत जो बसटी हूँ सब में
पर कोई मुझे न रोक पएय

मुझेई नहीं मालूम में काया कहना चाट इहूँ
में स्वाचंद विचार हूँ
प्यार हूँ
एक ख्याल हूँ
लारी हूँ प्रीत की

मंगलवार, 9 जून 2009

yaad

यादें इकठा कर
बुनती हूँ सपनो की चादर
रोज़ रात
ओढ़ के सो जाती हूँ

सुभह होते ही दिन चडते ही
आँखें खुलते ही
सुब उधेड़ देती हूँ चादर
दिन भर रहती हूँ खोई खोई
तेरे ख्यालूँ में रोई रोई
तुझ से करती हूँ बातें
हमेशां तुझे ही पास पाती हूँ

तुझ से मिलने की आस
तुहे देखने की प्यास
दिन भर दौडाती है
जिन्दा रख पाती है
तेरी याद तेरी प्यास
तेरी आस की फिर बुनती हूँ
चादर इक
सपनो की और सपनोमें खो जाती हूँ

allah

एक एकेली न कोई सहेली
मैं अलबेली नार नवेली

पर नहीं में अकेली
की अल्लाह है मेरा बेली

करती हूँ खुद से बातें
कहाँ गई वोह अकेली रातें

धरती मेरा बिछोना
अम्बर है मेरा ओड़ना

सागर मेरी कश्ती
यह कायनात मेरी हस्ती

मौजें मेरी पतवार
जाना है मुझे उस पार

प्रीतम की बाहूं में
बिछ जाऊं गी राहून में

मैं नहीं किसी की मुहताज
साथ है मेरे मऊला आज

मैं कहाँ एकेली
जब अल्लाह मेरा बेली

justjoo

उमंगें
उमीदें
आसरे
सहारे
आरजुएं
इच्छाएं
तमन्नाएं
इन्तजार
सब पुरे हुए
आज
अभी
इसी वक़्त
इसी घडी
जैसे ही
नाम इक
देखा
जाना पहचाना

सोमवार, 8 जून 2009

bewafa

बेवफा यह दिल मेरा
पल में जा हुआ तेरा
प्यार किया दुलार किया
फिर भी बोले पीया पीया
बहुत पकडा बड़ा रोका
फिर भी दे गया धोखा
कितना चाहूँ पास बुलाऊँ
फिर भी कहे मैं जाऊं मैं जाऊं
समझी है मेरा अपना
पराया था यह दिल अपना
बेवफा अधूरा सपना
जा दे दिया तुझे
नहीं चाहिए मुझे
बेवफा दिल यह मेरा
पल में हो गया तेरा

sapne

चांदनी रात में भीगी बरसात में
जग जग तारे गिनना अच्छा लगता है

कड़कती धुप मैं नंगे पावं छत पे जा के
तुम से मिलना अच्छा लगता है

रात में जागना
दिन में सपने बुनना अच्छा लगता है

तुम से मिलना
बातें करना अच्छा लगता है

कुछ अपनी कहना
तुम से सुनना अच्छा लगता है

घंटों सामने बैठ
तुम को तकना कुछ ना कहना अच्छा लगता है

झूठ बोल छुप छुप
चोरी चोरी तुम से मिलना अच्छा लगता है

प्यार हुआ इकरार हुआ
कहना सुनना अच्छा लगता है

सिखियूं में बैठ
तुन्हारी बातें करना अच्छा लगता है

कोई जो कह दे
तुम्हारी हूँ में सुनना कहना अच्छा लगता है

लिखना नाम अपना
साथ तुम्हारे नाम के अच्छा लगता है

सागर किनारे
साथ तुहारे घूमना फिरना अच्छा लगता है

मिल कर बिछ्रना
फिर मिलने का इन्तजार करना अच्छा लगता है

तुम से मिलना
मिलते रहना कभी न बिछड़ना अच्छा लगता है

जीवन का हर सपना अब अच्छा लगता है

शनिवार, 6 जून 2009

raahein

न आती देखी
न देखी कभी जाती
सब कहते हैं
यह राह मुझे
मेरी मंजिल पहुचाती
रहती सदा स्थिर
एक ही करवट
ता उम्र
मिटती जाती
आह न भरती
जलती दिन भर
कड़कती धुप में नंगे पाँव
सरपट भागती जाती
जड़े में भी न मौजे पहने
न जूते न चपल
बर्फ सी ठंडी हो जुम जाती
कौन सुने इस के कहने
न गिला करती न शिकवा कोई
कहने सब के माने
घर पहुंचाए काम ले जाए
सब के सब हैं इस के अपने
पर न होती किसी यह
जब राह भूलती जिस को यह
न मंजिल न काम पहुंचती
कहाँ रह गया घर
जाने किसको
गर न होती राहें
तो मंजिल काम न घर ही होते
होते भी सब
पर कोई पहुँच न पाता
बिन राहों के पहुंचे कौन

paimana teri yaad ka

बैठ कर मैखाने में प्यार के
जाम पे जाम पिए तेरी याद के

पैमाना प्यार का छलक छलक जाता हे
जब मैखाने में तू नजर आता हे

आन्खून में भर के जाम इन्तजार के
जाम पे जा पिएय तेरी याद के

देख फटे हाल मेरे दिल के
मैखाने का हर जाम छलक जाता हे

साकी बुझाए प्यास सब की
खुद प्यासा ही जाम मर जाता है

भरा भरा सा हर जाम
हर शाम भर भर खाली हो जाता हे

नजरूं के जाम जो पि ले कभी तू
देखना मेखाना कैसे झूम झूम जाता हे

गुरुवार, 4 जून 2009

naari

फूलूँ फलूं से लड़ी बेल सी होती हे नारी
जनम से ही मांगे सहारा बचिआं सारी
कभी बाप कभी भाई की बाहूं पर भारी
ता उम्र अंगुली पकर के चलना रखे जारी
कितनी भी बरी हो चाहे पहने साडी
फिर भी एकेले रहना परे भरी
उअर भर रहती मर्द की आभारी
तन मन उम्र उस के आगे हारी
रहती हे बन के दासी उम्र साड़ी
कभी बने बहिन कभी मातारी
जीवन सारा लुटा देती जाए दूजून पे वारी वारी
नहीं तू अबला नहीं तू नहीं बेचारी
नारी तू शक्ति हे नहीं तू बेसहारी
तुझ को न समझ पाई यह दुनिया साड़ी
यूं तो पूजे तुझे अल्लाह की कायनात सारी
तेरे आगे दुनिया की सब सूझ हारी
तू सुन्दर हे हे तू कितनी प्यारी
नारी यह जग रहेगा सदा तेरा आभारी

tasweer

सावन के महीने में
खुश खुश रहती हर दम
रंग बित्रंगे धारे वस्त्र
करके श्रृंगार
लाली ले सूरज किकिरानूं से
पहने गहने फूलूंके
माथे पे सजा के कुम कुम
करती इन्तजार झूम झूम
भर के प्यार सीना में
सावन के महीने में
जब घिर घिर आते बादल
कारे कारे बादल पहनते काजल
घटाए हवान में जुल्फे भिक्राती
सावन के महीना में
प्यार भर के सीने में
अचानक चमक उठती बिजरी जो
तस्वीर खीच जाती जमीन की
आसमान के सीना में
सावन के महीएने में

sookhe patte

सूके पत्ते
कल तह थे जो बातें करते हवा के संग
हिते डुलते झूलते द्रख्तून पे चढ़
खूब इतराते किस्मत पर अपनी
पतझर आया उसी हवा के झोंके ने
फिर दुलाया
ला जमीन पर पटकाया
हुए धरा शाई
मुँह के बल परे रहे गे
ठोकर में जमाने की
खटकते आन्खून में सब की
मिल ख़ाक में ख़ाक हो रहे गे
सूखे पत्ते
कभी किस्मत ने पलती खाई
हवा आई ले गई उरदा
कहीं कभी कहीं कभी
उरते उरते जा बेठे किसी प्रेमी के करीब
रख ले जो किताबोमें
खोए मीठी यादूं में
जी जाए फिर
एक उम्र और
हो जाएँ अमर
सूखे पत्ते

बुधवार, 3 जून 2009

ghariyaan

कलाई पे बंदी
याद दिलाती अपनी हर वक़्त
वक़्त याद दिलाती धरी
घरियाँ पहने तोरें बनाएं
ख़रीदे बेचे घरियाँ सब
ले ले कभी दे दे तोफे में
घरियाँ सब
दिन रात गिनते हम घरियाँ सब
पर इक ने मिलती
जिसे कह पते अपनी
जो हो के रह जाती अपनेइ
थम जाती साथ निभाती
कभी न मिल पति घरी इक
कहते सब मिल बीइठो घरी दो घरी हमारे संग
पर कहाँ किसी की हो कर रहती घरियाँ
जो बाँध बाँध
रखते कलाईयूं पर हम सब

antim ghari

टिक टिक टिक करती
दीवाल पे तंगी
कहती मन को टिक टिक
टिकने को कहती
पर न टिका पाती वक़्त
दो हाथ चलते
लगातार चलती बिन पेरून के
चलता वक़्त दिखाती
खुद देखो हे टिकी हुई
दीवाल पर घरी
बुलाती हर दम संन्नाते में गूंजती
सोते को जगाती
फिर खुद ही सुलाती वाकर पर
दीवाल पे तंगी घरी
सुब को भगाती काम पौन्चाती
फिर घर भी ले आती वक़्त पे
खुदही दीवाल पे तंगी घरी
जल्दी मचाती
परेशान करती
टिकी हुई भी कहती
चल चल जल्दी चल
खुद न कभी जल्दी करती
दीवाल पे तंगी घरी
यूं हो जीवन भर चलती
कभी न आक्ती
कभी न थकती
चलती चलती
दीवाल पे तंगी घरी
बस यूं ही इक दिन
चलते चलते
सुब छूट जाते पीछे रह जाती तंगी दीवाल पे घरी
जब आ जाती किसी की अंतिम घरी