शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

कौन हूँ में

कौन हूँ मैं ?
धरा हूँ , अस्तित्वहीन ..
या कि, भाव हूँ निराधार ..
विचार हूँ कोई अलिखित सा शायद ...
जिसे जेहन की स्लेट पर न उतारा गया हो अभी ..

माया हूँ या माया का अंश !
भूली भटकी हवा हूँ
बिन राह के मुसाफिर की मानिन्द
या फिर खंडहर हूँ किसी कालातीत ऐश्वर्य का ..

जहां दिखा खुला आसमान सा मन
बस उसी की हो रहती हूँ ...
जहां खीच दे कोई लकीर बह निकलती हूँ उसी और
रस धार बन कर नदी की मानिन्द ..

बरस जाती हूँ जहां कहीं होती है चाह रस की ...
न वजूद है कोई न अस्तित्व न हीं आकार मेरा
माया हूँ या माया का अंश !

ऐ मेरे मसीहा
दिखा दो राह बन जाओ ज्योति
मेरे मन की नैनों की
ले चलो उस पार
जिसे किनारा कहते हैं सब
जहां भर ले कोई अंजुली में मेरे प्रेम को
हो जाऊं धूल से फूल
अर्पण हो रहूँ चरणों में तेरे
तो मुक्ति पाऊँ होने से माया के
इस रूप से ...

3 टिप्‍पणियां:

DALVINDER BHANGU ने कहा…

App ke ander itna pyar bhara hai ki anjul mein nahi sama sakta use to ikk bada sa pyar bhara DIL chahia-- bhut down to earth bhav se likhe hai app ne yah kavita , dua karta khoon app ke murad poori ho

RDS ने कहा…

प्रेम मगन हो पुलक बढाती प्रीत भरी अमृत वाणी !
जीवन की एक रीत सिखाती प्रीत भरी अमृत वाणी !
रीते मन की झोली भरती प्रीत भरी अमृत वाणी !
अमृत की वर्षा कर देती प्रीत भरी अमृत वाणी !

प्रीत सुरों को सरगम दे दो प्रेम राग बन जाने दो
चर अचर ब्रह्माण्ड अखिल में वही राग छा जाने दो
सब सीमाए तोड जगत को एक धार बह जाने दो
माया हो, तो प्रीत बिखेरो सर्वत्र सुलभ मुस्काने दो

Ashok ने कहा…

Maya hoon Maya... jaan le loongi...
Yaad hai Moti