मंगलवार, 15 जनवरी 2013

मिलने किस्सी से .


बेजुबान वोह नज़रें 
 रुकी रुकी सी धरकने 
भटके भटके से एहसास
वोह बेबस बेबस सा मन 

 जाती हुई उस गाड़ी को
वोह ताकना तुम्हारा 
मिन्नतें          करता बेबस मन  ............... 
हवाओं से....वोह दुआएं अनसुनी अनकही 
.
 आज बन तूफ़ान  इतनी तेज बहो 
 रोक लो यूं की फिर जा ना पे कभी 

हाथ जो उठें दुआ के लिएय  
तो यही कहें बरिशूं से 
आज बरसो ऐसे  टूक कर
 रोक लो ना जाओ यूं कहीं ...

खुदा करे की क़यामत हो
 औररह जाए तू यहीं कहीं 
रह रह कर यही कहे मन ........

जलजला उठें कुछ ऐसे 
की रह जाओ आज यहीं 
 थाम ले तेरा हाथ .....
पकड़  कर पाऊँ तेरे
 जिद्द करे ना जाने दे कभी 

ना जाओ सजनी 
यूं छोड़ कर मुझे 
एकला नहीं रह पाऊंगा में
दे दूं गा जान अपनी 
 मर जाऊं गा 

 
उधर विडंबना 
यह है की कुछ ही दूर पर 
 सच खड़ा है 
बाहें पसरे 
करे इन्तजार 
बिछाए निगाहें 
की कब आए गी मेरी सजनी 
उस पार जो  गई थी कभी 
मिलने किस्सी से ......
आज् लौत आए गी .........
 

मेरा मरना हर दम

तेरी याद  पल पल 
तेरी बातें रोज़ रोज़ 

तेरी खुशबू हर सु 
तेरे सपर्श दम दम 

तेरा होना दिन दिन 
 तेरे सपने रात रात 

तेरा आना ख़ुशी ख़ुशी 
तेरा जाना गम गम 

तेरी उम्मीद घडी घडी 
 तेरा मिलना बार बार 
 
 तेरा बिछुरना आज कल 
तेरा साथ जनम जनम  

तेरी चाहत  हर दम 
 तेरा प्यार सदियूं सदिऊँ 


तेरा एहसास छिन छिन 
तेरी तम्मना रोज़ रोज़ 
तेरा इन्तजार पल पल 
 तेरा मिलना कम कम 

मेरा दिल  धरक धरक 
मेरा रोना जार  जार 
 मेरा जीना कम कम 
 मेरा मरना हर दम 

गम यूंही जाता रहे गा जुदाई का तेरी

किस देश में रहती है मेरी बेचैनी
कौन शाहर मेंदिल धर्क्ता है मेरा 
 कहाँ से कोई पुकार रहा है मुझे 
 संदेसा कोई ला रही हैं हवाएं 
 बदली बरस बरस बिखेरती तेरे आंसू
मेरी हेठेली में खजाने बन गे हैं मोतियूं के 
जानती हूँ तुम ने आज भेजा है धुप को मेरे आँगन में 
 कल देखि थी वोह चांदनी 
जो जहाँ रही होगी तुम्हरी किद्की से 
 उस में नहा कर लौट देना मेरी और 
उसे ही औध कर सो जननो गा में 
मीठे सपनो के मिलन भर से ही 
गम यूंही जाता रहे गा जुदाई का तेरी 

बस एक ......तेरी कमी


धुप खिल खिला रही 
लोग मिल मिला रहे 

फूल मुस्कुरा रहे 
भंवरे गुनगुना रहे 

घंघोर घटा छा  रही 
 हवाएं भी  देखो भाग रही 

मन आँगन  सब परसन्न हैं 
मौसम में जैसे बसंत आ गई 

इतराता चाँद  चांदनी भी प्रसन्न है 
तारे टीम टीम रहे  रात भी जवान है 

रिम झिम रिम झिम बूंदें टपक रही 
मन को  मेरे यूं ही रिझा रही 

सब कुछ है ज्यूं  का तयून 
बस एक ............
 तेरी कमी है खल रही 

यूं ही सुनेहरा दिन उगता  है 
यूं ही रात खुशनुमा ढल जाती है 
बस एक ..........
तेरी कमी दिल को धड़का  जाती है 
बस एक ........

जीवन को जीना है जिन्दगी की मजबूरी

रोक सको तो पवन के वेग तो रोको तुम
हरे पीले सूखे पते सब उडीजाएं गे उड़ना है उन की मजबूरी
रोक सको तो बसंत को आने से रोको तुम...
फूल तो खिलेंगे खिलना है फूलूँ की मजबूरी
रोक सको तो चंदा की चांदनी कोरोको तुम
रात महकेगी चांदनी रात की है मजबूरी
रोक सको तो सूरज को उदय होने से रोको तुम..
सेहर तो हिगी ही हर दिन है सेहर की मजबूरी
रोक सको तो रोको जीवन को तुम ...
दिल तो धर्केंगे धड़कन है दिल की मजबूरी
रोक सको तो सांसो को रोको तुम...
जीवन को जीना है जिन्दगी की मजबूरी

इंतजार

पलके झपकना भूली
पर दिल धर्क्ता है आज भी 
दिन उगता है इस आस लिए
सांझ सपने बुनती रहती 
तलब ऐसी जो मिटाए ना बने 
आग ऐसी जो भुजे ना बने 
येह्दिल की लगी नहीं पल दो पल की
यह इन्तजार हैं जन्मून के 
यह प्यास नाबुझे गी कभी 
यह इंतजार होई हैं मेरी जिंदगी अब
 

कही नजर ना लग जाए



चांदनी  ने ओढा है घूँघट 
 अन्धेरून  का 
मुस्कान मूह छिपे बैठी है
 उदासी के आढ़ में 

आन्सूनूं का पर्दा करती हैं
 यह मुस्कुराती आँखें 

दिल बेबाक
 धरकने सेडरता है 

यादूं के ढेर पर
पहरे लगा दिए हैं 

 गठरी पयार की
 बाहूं में कस  ली है
बातें सब छिपा दी हैं
 काले संदूक में 
 इन्त्जारून को किवाड़
भीतर से  कर दिया है बंद 

बतियान सब गुल
 कर के रूह के घर की 

खिड़की  में जरा सा छेड़ है 
 हर आहट पर झाँक झाँक लेता है मन 
डरता है ना ..................................
कही नजर ना लग जाए
  मेरी चाहत को
रकीबून की 
aaj phir ek baar woh raat aai hai 
jis ka intjaar saal ke shuru hote hi shuru ho jata hai 
kal 365 dino ke baad naye saal ka aagman hoga
bahut se prn liey jaein gey jindagi behtar aur
behtardar banane ke.
par hota kaya hai.....

 sal ke shuru hote hi
 din itni tej rftaar se bhangne lagte hein
 ki kab 31 dec aa jati hai pata bhi nahi chalta 
yoonhi din maheen saal beet te chale jaate hein 
jindagi aur samay band muthi se
 khisakti rait ki tarh kab khtam ho jati hai
 humein ehsaas bhi nahi ho pata 
par kaya hum khush hein ?

shayad nahi .......................

 kayoon ki hum ne sinjo kar rakha hai
 apne din maheene saalo ka a sangreh jo humari dukhad yadein hein 
kayoon hum jab bhi peeche mudh kar dekhte hein 
apne hassenpal payare log sundar rishton aur khushnuba din yaad na kar ke 
apne jeewan ke kaante been been kar gathri bana pane andhoon par us ka bojha uthae dukhi udaad ghumte rehte hein ?

chalo aaj naey saal ke din hum sab apne beete dinno ki dukhad ghtnaaon ko kisi kaale sandook mein rakh kar kaheen jal parwaah kar aaein 

aur apni khushiyoon ko apne mitro doston rishtoon ke sukhd palon ko rang birange phooloon ki tarh ek fooldan mein saja apne aas paas yoon rakh chhodein ki jab bhi man udaas ho dukhi ho un paloon khoobsurat phooloon ki aur ek nazar daalein aur apne jiwan mein bitaey sukhad paloon ke nazare apne jehan mein la kar un meethi yaddon se naha naha jaein aur sadev sadev ke liey khush ho rahe 

aur us parm pita parmeshwar ka shukriya ada karein ki us ne humein yeh din dikhaya .....

रविवार, 8 अप्रैल 2012

प्यार का रंग लाल गुलाल

ना हास्य ना व्यंग
में तो जानू बस एक ही रंग
प्यार का रंग लाल गुलाल
ना वीर रस ना भद्र रस
में तो जानू बस सिंगार रस
मेरे प्यारे प्यारे प्रीतम का रंग
अपने प्यारे का रंग
लाल गुलाल

सुनते ही नाम होली का
में तो बस अपने कान्हा ही होली
में प्रहलाद की होली
रंगों किहोली में
में अपने प्रीतम की होली

लो आई होली आज लो आई होली
भांग चदा कर
ढोल बजा कर
मुह पर मल कर गुलाल
घूम घूम कर गली गली नाच नकच कर
कर के हाल बे हाल
लो आज आई रे होली
लो होली आई रे आज

देखा इधर और देखा उधर
सबकी बदली है आज चाल
बचे बुद्धे जवान सभी
सूझवान अल्हध हो या हो नादाँ
ले कर हाथूं में रंग
हरा हो या हो लाल
सभी मिल रहे गले लगें सब खुश हाल

गली गली भागती दौरती
अभी इस गली तो अभी उस गली होली
रे होली
लो आई रे होली
होली आई रे आज

पर इस बीच कयूं कर में भूलूँ
उस अपने को
जो है मेरा लाल गोपाल
कर के उस का ध्यान में आज
कयूं ना में उस की होली

लो में तो होली जी
उस अपने की होली
आओ सब मिल कर गले ले कर हथून में गुलाल
चलें उस के घर जहाँ हेई बसा हमारा लाल गोपाल
मिल कर अपने प्रीतम से
कर लें आज हाल बे हाल
कयूं के

लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल
लाली देखन में गई मेंन भी हो गई लाल
हम सब को होली के इस सुब्ह अवसर पर ढेरों सुब्ह कामनाएं

आली रे होली

आली रे होली सखियों आज होली आली रे
पी कर सुब्ह सवेरे चाय की प्याली
भर कर बाल्टी रंगों की सभी खली खली
आली रे आली भाइयो आज होली आली रे
सब सखियाँ हेंरंगी यूं ज्यों फूलों की डाली
भाई भी सभी ऐसे मेंकयूं रहे खाली जी खाली
भर कर लाओ भांग गिलास हो या हो पियाली
नहीं बचे गा कोई आज जीजा हो या हो साली
आली रे होली उम्मा आज होली आली रे
रंग डालो सभी आज नहीं देगा कोई भी गली
कैसा भी हो रंग चेहरे का छाई है फिर भी लाली
धूम मचा कर भंग चदा कर ले कर रंगों से लाली
मिल कर कर गले हमने आज हर ख़ुशी है पाली
आली रे होली बाप्पा आज होली आली रे आली

ऐसा हो नहीं सकता

आंसुओं की लगी हों कतारें
या हों यादूं के सिलसिले
और तेरा जिक्र नहो
ऐसा तो हो नहीं सकता


उदासियूं का मेला लगा हो
या हो रौनके चुपिऊँ की
और तेरा जिक्र ना हो
ऐसा हो नहीं सकता

वीरानू का हो जमघटा
या हो तन्हाई की बातें
और तेरा जिक्र नहो
ऐसा तो हो नहीं सकता

यूंही जाड़ों की करें कहानियां अगर
या सूखे पते मिलें किताबून मेंकभी
और तेरा जिक्र ना हो
ऐसा हो नहीं सकता

टूटते ख्वाबून की आहट हो
या हों लम्बी काली रातोकी बातें
और तेरा जिक्र ना हो
ऐसा तो हो नहीं सकता

कभी विदा करें जो किसी को
किसी मोडपरयूं ही रुक जाएं जो कदम
और तेरा जिक्र ना हो
ऐसा तो हो नहीं सकता

वोह कहींदिखई देता नहीं

कभी कभी ऐसा लगता है
साथ अपना छूट गया है कहीं पीछे

हाथ जो खुद का थाम रखा था खुद ने
आज कल पकद में आता नहीं

देख कर आईने में अक्स अपने
पहले देखा है कहीं
ऐसा लगता नहीं


अपने ही स्पर्शून को महसूस कर पाते नहीं
खुद से बातें करने की आदत सी छुट गई है पीछे कहीं

इतना शोर है तन्हाइऊन का
फिर भी
जो तुम कहा करते थे
आज भी स्पष्ट सुनाई देता है

खुली हो या हूँ बंद यह आँखें
इन्मेंजो इक अक्स दिखा करता था
वोह कहींदिखई देता नहीं

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

जिंदगी

जिंदगी


बहुत खूब और अजीब होती है जिंदगी

रहती तो है करीब पर न होती है कभी

चलती है साथ साथ साए सी ज़िन्दगी ।
मगर बहुत दूर सी लगती है जिंदगी ॥

आज इस के पास है तो कल उस के पास ।

मेरा ही कुछ गुनाह कि मेरी हुई न जिंदगी

क्यूँ न कर सकी वफ़ा मुझ से ही मेरी जिंदगी
कर के वादा भूल कयों गई मुझे ये जिंदगी



देखना रूठ ना जाना कहीं मुझ से एह जिंदगी

यूं हिकभी जो मूह फेर लिया तुने
तो मौत के घर चली जाए गी यह डोली मेरी
एह जिंदगी

मुठियाँ


मुठियाँ

कस के बंद कर लेने से
ना थाम सकते हैं हम
समय को ना यादूं को
नहीं ही दिन की धुप को
अपने साए
चांदनी की खुशबू
बूँदें बरिशूं की
उठती गिरती लहरून की रवानगी को
चमकती बिजलियूँ को
सपनो को
ख्यालूँ को
सोच को

बस समंदर किनारे की बालो
सामान होते हैं यह सब
जितना स्टे हैं हम
मुथियूं को
उतना ही खोते हैं
चले छोड़ दें ढीली कर देखें यह
मुठियाँ
सारा जहाँ हमारा हो रहे गा
ना कुछ पाने कीछा ना खूने का डर

मुठियाँ खोल दो सभी
मुठियाँ

यूं ही नहीं

कभी हाथूं से नहीं
सान्सून से नहीं
दिल के तारून से बंधी हैं
गांठे हैं यह पक्की
यदुन की मोहताज नहीं हैं
रित सी नहीं हैं
जो खिसक जाएंगी बंद मुथिओं से
सदियूं से पहले युगून से परे
जनामून से बढ़ कर
होते हैं यह रिश्ते
मिलन जो आत्माओं के हॉटइ हैं
बाद्लूँ की ओट से
झांकती यह जो बिज्लोइयाँ हैं
यह हैं साक्षी हमारे ओने के
हमारे साथ की
कहती हैं यह कहानियां
यूं ही नहीं होते हैं यह मन के रिश्ते


क्यूं ,
इतनी पीढ़ा
इतनी उदासी
कयूं
इतना खींचते हो
खुद से लड़ते हो
झगड़ते हो
कयूं
हमेशा सीधे सीधे देखते हो
खुद को मंजिल को

... ये पीड़ा ये परेशानी
ज़रा सी बात है समझो ......

तुम्हारे साथ हैं सूरज
तुम्हारे साथ बरसातें

चमकती चोटीयाँ हैं
और हैं बातें जहानो की
बहुत से चाहने वालूं की

ज़रा देखो नज़ारे ढूँढ़ते हैं
जिंदगी तुममे

इन्हें बाहों में भर लो और
छू लो हर सितारे को

तुम्हआरी उम्मीदों से
रोशन कितनी राहें हैं

थक कर कहीं पे बैठ न जाना मेरे साथी

उठो थाम लो अंगुली खुद की
बदलून के उस पार
है एक जहां
जहां होंगे सब सपने साकार

बुधवार, 2 नवंबर 2011

दीवाली या खुदा का नूर

आज ऐसा ही कुछ एहसास हो रहा है मुझे भी दीपावली के इस शुभ अवसर पर
खुदा भी आसमान से जब जमीन पर देखता होगा
तो मेरे सेहर को देख कुछ ऐसा ही कहे गा

देखा जो दूर से आज शर अपना
लगा खुदा खुद उतर आया है जमीन पर आज
हर सू उस का ही नूर छाया है आज
दुल्हन सी सजी है रात अमावास की आज
मांग सितारून से सजी है उस की आज
आँचल में कृपा बरस रही लखमी की आज
ओन्थून पे मुस्कान दिल में तम्नाएय हज़ार
हर देहलीज पर ज्योति आमंत्रण की जली है आज
थाल भरे हैं खुशियूं से
लड्डू फूट रहे आँगन आँगन आज
मीठा सा हो रहा है यह मन भी आज
रूह भी तो देखोरोषण है कितनी आज
तोहफे पयार से मिल रहे हैं गले आज
रौशनी मिठाई खुशीआं पठाखे मिलन तोफे और ढेर सारा पयार
लाया है दिवाली का त्योहार आज
आओ मिल कर ख़ुशी मनाएं गले मिलें खूब पटाखे बजाएं
लो आई दिवाली आज लो आई दिवाली आज
कविता ना लिखी ही जाती है ना कही
बस होने लगती है खुद ब खुद
जब जब
खुदा के पाक हाथ छू जाते हैं
किसी जबीं को
थाम लेते हैं जेहन की अंगुली
कर के रूह के पंखून पर सवार
ले जाए ब्रह्माण्ड के उस पार
खुद ही खुदा
तो उस के नक़्शे प् ही हो रहते हैं
किसी कविता के हर्फ़
और रह रह कर उभर आते हैं जेहन में
उत्तर आते हैं किसी की जुबानी
कविता बन बन

शुक्रवार, 10 जून 2011

सजा लो पलकों पर आंसू बना
>झंकार बना रख लो अपने साजून की तारून पर
>कर लो शामिल अपने गीतूनमें
>बना लो मुझे अपने बोल
> चाहे गम ही अपना समझ
>बसा लो दिल में
> बिठा लो अपनी यदुन की कतारों में कभी
>रख लो अपनी धर्कनूमें
>रूह से चिपका लो मुझे
>आपने स्पर्शून्में से कुछ सपर्श बाँट लो मेरे साथ
> रख लोअपने भीतर कहींभी
>टीस सीने की चुन्हन चाहे हो रहूँ मन की
>देदो ना थोड़ी जगह अपनी जिन्दी में मुझे भी
>की जी जाऊं में पल दो पल
>साथ तुम्हारे
>नजर भर देख लो एक बार जो
>जी जाऊं में युगून तह यूंही
>--
>नजरूं से उतर कर
> चल के के पाऊँ पाऊँ
>धर्कनू पर हो कर सवार
>लगाम ले कर हाथूं में
>दौराते घोड़े अपनी धरकनो के
>छू लो मुझे
>थाम लो मेरे हाथ आज
>समेट कर सब अपने जज़्बात
>रोक लो साँसे अपनी
>खो जाओ
>सपनो में
>और आ जाओ ..........................
>
>मेरे दिल के आगोश में ............
>
> बस रहो
> कर लो घर इसे अपना
> की आज घर पर कोई नहीं
>बस में और तुहारी यादें
>खेल रही हैं आंखमिचोली
>
>अब चले भी आओ ना सताओ
>की थक गई हैं साँसे मेरी
>अब नहीं तक सकती और राह तुम्हारी
>मेरी नजर कमजोरे हो चली
>
> किवाड़ भी तक तक ऊंघने लगा है
> दस्तक को भी ऊंचा सुनने लगा है
>
>चले आओ अब तो
>की मूँद पाऊँ मैं यह पलकें थकी थकी
इक टीस दिल में उठती रहे गी
>कमी तुम्हारी खलती रहे गी
>
>सर्द हवाएं तीखी दोपहरी
>तेरी याद यूंही बनी रहे गी
>
>सावन की बद्री हवाएं पतझर की
>साथ मेरे यूं ही चलती रहे गी
>
>वोह चाय की प्याली
>वोह सिगरेट बुझी
>तेरे जाने की खबर देती रहे गी
>
>सिरहाने खामोश
>वोह सिलव्तें चदर की
> कहानी रात खुद अपनी कहे गी
>
>वीरानी गलियां
> खामोश रातें
> चांदनी यूंही एकेली पड़ी रहे गी
>
>

रविवार, 1 मई 2011

क्या यही प्रीत है

जो मद्धिम हवा के झोंके सी

जो झरने के मीठे पानी सी

जो प्रीत के आंसू सी खारी

जो श्रम-संचित बूँद पसीने की !

क्या यही प्रीत है ??

जो खुशबू का एहसास लिए

जो चाहत की मीठी प्यास लिए

मिलने का इन्तजार लिए

नज़दीकी का एहसास लिए

क्या यही प्रीत है ??

जो वियोग डर से कम्पित

जो तन्हाई भय से शंकित

वो रुनझुन से करती छा जाती

अकस्मात ही आ जाती

क्या यही प्रीत है ??

वो बने काव्य, और भा जाए

तो प्यार न कैसे हो जाए

डर है ये टूट न जाए लड़ी

जिससे मेरी हर याद जुडी

कविता है बस्ती है मन में

अटखेली करती मन आँगन में

क्या यही प्रीत है ??


तेरी याद में

याद तेरी बस आती है

दिल की धडकन बढ़ जाती है

चित चैन कहीं खो जाता है

जब तू ख्याल में आता है |

स्पर्श सभी जग जाते हैं

आँखें भी नम हो जाती हैं

आँखों से आंसूं झरते हैं

ज्यों मन का ताप पिघलता है

पल-छिन महीने बरस-बरस !

दिल मिलने को गया तरस !

पलक पांवड़े बिछा राह में

सदियों से मन की एक पुलक !

चाँदनी रात की चादर पर

कदम कदम हम बढ़ते हैं

मंजर, सफ़ेद पन्नो पर ज्यों

कुछ हरफ –ब-हरफ उभरते हैं

कि, यकायक ही हर सु

कविता सी बिखरने लगती है

जिसे समेटे आँचल में हम

दिन रात मचलते फिरते हैं

यही धरोहर छुपा जगत से

सीने से लगाए फिरते हैं

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

मैं, तेरी छाया !!

शीतकाल की मद्धिम धूप बनूँ और तुझ पर मैं छा जाऊं

मैं बनूँ ग्रीष्म में छांव, तुझे रह रह कर शीतल कर जाऊं

बन जाऊं बदरिया सावन की, बरसूं मन पर घनघोर पिया

चमकूँ यादों की बिजली बन, ‘बाती’ मैं - तू मेरा ‘दिया’

बन जाऊं शीतल मंद पवन, तेरा तन मन दरसूं-परसूं

बन जाऊं बहती नदिया, कि बन लहरे, मैं हरदम हरसूँ

जल बन कर सारी प्यास बुझादूं तेरे तन मन के उपवन की

तितली बन तुझ पर मंडराऊं, हो जाऊं तेरे मधुबन की

क्या यही प्रीत है

जो मद्धिम हवा के झोंके सी

जो झरने के मीठे पानी सी

जो प्रीत के आंसू सी खारी

जो श्रम-संचित बूँद पसीने की !

क्या यही प्रीत है ??

जो खुशबू का एहसास लिए

जो चाहत की मीठी प्यास लिए

मिलने का इन्तजार लिए

नज़दीकी का एहसास लिए

क्या यही प्रीत है ??

जो वियोग डर से कम्पित

जो तन्हाई भय से शंकित

वो रुनझुन से करती छा जाती

अकस्मात ही आ जाती

क्या यही प्रीत है ??

वो बने काव्य, और भा जाए

तो प्यार न कैसे हो जाए

डर है ये टूट न जाए लड़ी

जिससे मेरी हर याद जुडी

कविता है बस्ती है मन में

अटखेली करती मन आँगन में

क्या यही प्रीत है ??


बुधवार, 2 मार्च 2011

यादों का झरोखा


जब भी किवाड़ के पीछे से,
झाँका किए हैं हम ..........

मिली हमे अपने आँगन में
बिखरी सी खुशियां छम छम ....
मुठी भर था आसमा
थाली भर थी रौशनी ...
भगोना भर भर चांदनी ...

तारों की छांह कटोरी भर-भर
ओस की बूँदें चम्मच भर-भर ...
मिली हमे अपने आँगन में
बिखरी सी खुशियां छम छम ...
खिड़की के पीछे से,
जब भी झाँका किए हैं हम ..........
पाए, झौखे सर्द-गर्म से
झरते पत्तों का दीवानापन .....
बहारेबसंत भी थोडा थोड़ा
बरखा भी भीगी भीगी सी ......
ज्यों जुगनू सी कोई कोई
यादें आएं, खोई खोई सी .......

और झरोखे के कौने से,
जब भी झाँका किए हैं हम ..........

देखि हैं कुछ मीठी मीठी बातें
कुछ खाते खाते पल
कुछ मिलन की खुशियाँ
जुदाई का ढेर सारा गम ........

जब भी कभी झाँका है हमने
किसी द्वार की आड़ ......
पाया हमने इंतजार ही
और प्यार की प्यास ....

फिर जब अंत में झांका हमने
अपने ही गिरहबान में
देखे हमने रेशमी रिश्ते
और वो ढलका ढलका आँचल ...
वो अखियों का शरमाना |
वो मिलन के पहले पल ...
वो रूठना मनाना |

जब भी कभी चुपके से बैठ
सोचा किए हम ...
तुम ही तुम हो हर सू
वो तुम ही हो
हर पल हर दिन ...

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

घनी इक छांव से हो तुम


सुहानी शाम से हो तुम
बसंत बहार से हो तुम

घनी इक छांव से हो तुम
सुकूँ-आराम से हो तुम


मधुर संगीत से हो तुम
मधुर झंकार से हो तुम

मधुर मुस्कान से हो तुम
मेरी तो शान से हो तुम

कोई सपना सा हो तुम
मेरा अपना सा हो तुम

मेरे दिल की धडकन तुम

मेरी सांसों की सरगम तुम


अनबुझी-प्यास से हो तुम

अनकही-आस से हो तुम

मेरी तो जिंदगी हो तुम
मेरी तो जान ही हो तुम ........

एक उदास सांझ ...


पतझड़ के सूखे पेड

मुरझाए फूल

पथरीली चट्टान

ठहरे झील के पानी से

रात अमावस की

कडकती दोपहरी बैशाख की

तूफानी हवाएँ

वीरान फिज़ाएँ

इतनी खामोशी

कभी उदासी हो नाम हमारा ...

कभी कहानी

अधूरी सी

तो कभी कविता

अनकही

टूटते सपने कहीं

नाउम्मीदी कभी

जो भी हों

जहां भी हों

हम

दुःख ही होते हैं

दुःख ही देते हैं

क्या उदासी ही है नाम हमारा ?

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

परछाई ...

कभी तू झरना झर-झर प्यार
कभी बासंती - मस्त बयार
कभी परबत सा ठहरा ठोर
कभी सन्नाटा हर ओर
कभी तू निखरी निखरी धूप
कभी चाँदनी सा मृदु रूप

कभी तू तितली वन उपवन
कभी भंवरे की सी गुनगुन

कभी कश्ती कभी पतवार
कभी साहिल कभी मझधार
कभी पतझड़ कभी बहार
कभी इस पार कभी उस पार
में हूँ जो तेरी परछाई ...
तू जिस दिस जाए मैं जाती हूँ
जिस रंग में तू रंग ले साजन
में वैसी ही हो जाती हूँ

रविवार, 30 जनवरी 2011

औढनी जब से उडी-उडी
दिल धडके मेरा घडी-घडी

अनजान याद से जुडी-जुडी
मेरी सब राहें मुड़ी मुड़ी

चाहे जुल्फें उलझी-उलझी
पर उलझन सब सुलझी-सुलझी

जज्बात जो थे उखड़े-उखड़े
जो कहते थे मेरे दुखड़े

ध्यान था तब बिखरा-बिखरा
पर अब है मन निखरा-निखरा

जब से तुम से मैं मिली-मिली
कितनी रहती हूँ खिली-खिली

सपने नयनों में यों जुड़े जुड़े
जब से ये नयना लड़े लड़े

गम हुए सभी अब जुदा जुदा
शुक्रिया तेरा ऐ . खुदा खुदा