रविवार, 2 अगस्त 2009

तुम कब आओगे

नयनों के दीपक जला,
कर पलकों की ओट
छुपाए पावन झकोरों से
प्रीत प्यार की ज्योत

ठहरी है धड़कन मन की
यही कहीं देहलीज़ पर
कब आओ गे प्रीतम प्यारे
तुम मन की देहलीज़ पर

बुझ ना जाए आस मेरी
यही है डर मुझको भारी
पलक झकोरे खोले बैठी
इंतज़ार में मैं बेचारी
सो ना जाए धड़कन मेरी
कब आओगे क्या है देरी

हवा में खोजूं महक तुम्हारी
फिजां में बसी हो सांस तुम्हारी
आस तुम्हारी साँसें मेरी
हर आहट पर आसें मेरी
हर साया, कि ज्यों तुम तुम आए
कब आओगे क्या है देरी
कब आओगे क्या है देरी

2 टिप्‍पणियां:

bhupinder ने कहा…

woo jab yaad ayee bhoot yaad ayee. very good.

RDS ने कहा…

ये कैसी प्रतीक्षा है जो कभी खत्म ही नही होती ... न तृप्ति मिलती है न संतुष्टि... देह सुलगती रहती है प्रीत दहकती रहती है... ये प्रेम भरे मन के समुद्र की छाया का परावर्तन ही तो है ...

ओशो कहते है : "प्रेम मे तुम्हे वही दिखायी पडेगा जो तुम हो । दुःख, आनन्द जो भी चित्त मे लबालब होगा वही प्रतीत होगा .. अगर तुम्हे परमात्मा का अनुभव हुआ है तो तुम्हे हर प्रेम पात्र मे परमात्मा दिखायी पडेगा... और निश्चित कही प्रेम जब प्रगाढ होता है, परमात्मा तक पहुंचने कासेतु बन जाता है..."

प्रतीक्षा भी तो अव्यक्त प्रेम की प्रतीति ही है ।

शानदार कविता, जो मन के बन्धन खोलती सी प्रतीत होती है...