मंगलवार, 2 जून 2009

likhoon kuch

डुबो के कलम ल्फजून की
साही में अरमानो की
ले के मशवारे इरादे से
बिठा के ख्यालूँ को
आँचल के झूले में
रोज़ बातें करती हूँ
अन्गुलियूं से
लिखती हूँ पाती
पर लिख नहीं हूँ पाती
जब तक न मिल जाए
कोई एक साथी
जो देदे अपने कान
सुनने को मेरी तान
मेरे ख्वाबून की उदान
चले मेरे संग
पहचाने मेरे सब रंग
देखे हूँ जिसने मेरे ढंग
हो लूं में उस के संग

तो लिख पाती पाती
में उसी की ही हो जाती

2 टिप्‍पणियां:

bhupinder ने कहा…

aap ne to kamal hi kar diya .

RDS ने कहा…

किसने किसको देखा है, किसने किसको जाना है ?
हर रूह यहाँ भटकी भटकी हर शख्श यहाँ अनजाना है |
जो कान धरे और तान सुने, अमृत घट का दीवाना है |
जिसको तुम अपना मान चले वह भी अब तक बेगाना है |
विरह मिलन है मन का क्रंदन भाव उठे उड़ जाना है |
दो पल की जुदाई क्या कहिये जीवन ही आना जाना है |