सोमवार, 13 दिसंबर 2010

दिन है पर किरणे बुझी बुझी
हवा भी बोझिल थकी थकी
मायूस पेड़ भी झुके झुके
पत्ते कुम्हलाए झरे झरे
फूल उनींदे थके थके
वीरानापन, जग भर पसरा
सन्नाटा ही सन्नाटा
दिन ऊंघ रहे गलियारों में
रातें उनींदी जगी जगी
बिसर गए प्रीतम तुम जब से
मौसम कितना वीराना है ..

2 टिप्‍पणियां:

Ashok ने कहा…

... हाँ तुम ऐसी ही थी ... इस बार तुम पहचानी जा रही हो ... बढती उम्र के परदे के पीछे से झाँक रही हो गुरखे चेहरे वाली ... क्या बचपन याद आता है ... और तुम्हारा पहला प्यार जिसकी बातें हमें सुनाती थीं अक्सर ... लिखो न अपने बारे में ... उन मौसमों हवाओं नदियों और बादलों के बारे में ... और बाबा जी को छुओ न ... तुम बहुत अच्छा लिख सकती हो ...

harminder kaur bublie ने कहा…

aap ko yahhan dekh kar man parassann ho gaya aur bachapan ki bauble ko siraf aap hi jaante hein na
aur un baato ko yaado ko bhi aap hi jaaante hein ji
shukriya yaad karne ka ji